Advertisement
बसंत पंचमी के दिन पीले फूलों से सजती है दिल्ली की मस्जिद, होता है भव्य आयोजन, जानें इसके पीछे का रहस्य
बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह पीले रंग से रंग जाती है. पीले वस्त्र पहनकर हर धर्म के लोग उत्साह और खुशी मनाते हैं. यह खुशी और उत्साह मां सरस्वती के पूजन के लिए नहीं, बल्कि एक शिष्य द्वारा अपने गुरु की खुशी के लिए मनाया जाता है, और 700 साल पुरानी इस परंपरा का आयोजन आज भी होता है.
Advertisement
बसंत पंचमी का त्योहार ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है. इस दिन ज्ञान और संगीत की देवी मां सरस्वती को पीले रंग के फूल और वस्त्र अर्पित किए जाते हैं. पूरे देश में 23 जनवरी को मां की अराधना होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की मस्जिद भी पीले रंग में सराबोर हो जाती है और गंगा-जमुनी तहजीब का बड़ा उदाहरण पेश करती है?
बसंत पंचमी पर दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन दरगाह पीले रंग से रंग जाती है
बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह पीले रंग से रंग जाती है. पीले वस्त्र पहनकर हर धर्म के लोग उत्साह और खुशी मनाते हैं. यह खुशी और उत्साह मां सरस्वती के पूजन के लिए नहीं, बल्कि एक शिष्य द्वारा अपने गुरु की खुशी के लिए मनाया जाता है, और 700 साल पुरानी इस परंपरा का आयोजन आज भी होता है. बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह में 'सूफी बसंत' मनाया जाता है और मस्जिद में आने वाले लोग पीली चादर भी चढ़ाते हैं.
Advertisement
हजरत निजामुद्दीन अपने प्रिय भतीजे के निधन से शोक में थे
Advertisement
परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात करें तो कहा जाता है कि 13वीं-14वीं शताब्दी के मध्य में हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने प्रिय भतीजे के निधन से शोक में थे. वे न किसी से बात करते थे और न ही ठीक से खाते थे. अपने गुरु की हालत अमीर खुसरो से देखी नहीं जा रही थी और वे इस समस्या का समाधान भी नहीं निकाल पा रहे थे. ऐसे में बसंत पंचमी के दिन उन्होंने कुछ महिलाओं को पीले वस्त्र और पीले फूलों के साथ देखा. पूछने पर महिलाओं ने बताया कि वे पीले रंग के फूलों का इस्तेमाल अपनी देवी सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए करते हैं.
क्यों दरगाह में सूफी बसंत मनाया जाता है?
Advertisement
ये सुनकर अमीर खुसरो को लगा कि पीले फूलों को देखकर उनके गुरु भी खुश हो जाएंगे. उन्होंने पीली पोशाक पहनी और वे हाथ में सरसों के फूल लेकर गुरु के सामने पहुंच गए. अमीर खुसरो का ऐसा पहनावा देख हजरत निजामुद्दीन के चेहरे पर मुस्कान आ गई. उसी दिन से हर साल बसंत पंचमी के दिन दरगाह में सूफी बसंत मनाया जाता है.
सूफी बसंत का हिस्सा सिर्फ एक विशेष धर्म के लोग नहीं होते हैं
यह भी पढ़ें
खास बात ये है कि सूफी बसंत का हिस्सा सिर्फ एक विशेष धर्म के लोग नहीं होते हैं, बल्कि ईसाई, सिख और हिंदू भी होते हैं. यही वजह है कि सूफी बसंत को भारत की गंगा-जमुनी तहजीब के नाम से भी पुकारा जाता है.