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मां का चमत्कारी शक्तिपीठ, जिसकी मुस्लिम भी करते हैं पूजा... लेकिन पहले निभानी पड़ती हैं 2 रहस्यमयी कसमें

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित हिंगलाज माता मंदिर न सिर्फ हिंदुओं बल्कि मुस्लिमों के लिए भी आस्था का केंद्र है. इसे 'नानी मंदिर' कहा जाता है, जहां पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और मिस्र तक से मुस्लिम श्रद्धालु आते हैं. यहां की सुरक्षा और सेवा खुद मुस्लिम समुदाय करता है.

File Photo
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भारत-पाक विभाजन के बाद जहां एक तरफ पाकिस्तान में हिंदू धार्मिक स्थलों को लेकर लगातार नकारात्मक खबरें सामने आती हैं, वहीं दूसरी ओर बलूचिस्तान की पर्वतमालाओं के बीच बसा एक ऐसा दिव्य स्थान भी है जो आस्था, एकता और सौहार्द की मिसाल बनकर खड़ा है. ये जगह है मां हिंगलाज शक्तिपीठ, जिसे न केवल हिंदू श्रद्धालु बल्कि बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग भी ‘नानी मंदिर’ या ‘नानी पीर’ कहकर पूजते हैं. यहां हर साल हजारों लोग न सिर्फ दर्शन करने आते हैं, बल्कि कई मुस्लिम खुद इसकी सेवा और सुरक्षा में भी जुटे रहते हैं. 

हिंदू-मुस्लिम एकता का अद्भुत प्रतीक

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित हिंगलाज माता का मंदिर उस समय चर्चा में आता है जब दुनिया धार्मिक कट्टरता से लड़ रही होती है. यहां के दृश्य किसी कल्पना से कम नहीं लगते. मंदिर के भीतर लंबी लाइनें लगती हैं जिनमें हिन्दू महिलाएं चुनरी ओढ़े होती हैं तो मुस्लिम महिलाएं पर्दे में नजर आती हैं. पुरुषों में भी कोई टोपी पहने होता है तो कोई तिलक लगाए. लेकिन मंदिर के परिसर में यह फर्क कोई मायने नहीं रखता. सभी सिर झुकाए एक ही शक्ति के सामने खड़े होते हैं मां हिंगलाज के चरणों में. 

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कठिनतम यात्रा, मगर अटूट श्रद्धा

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माना जाता है कि हिंगलाज यात्रा, अमरनाथ यात्रा से भी कठिन है. बीहड़ पहाड़, रेगिस्तान और गर्म हवाओं के बीच से होकर गुजरने वाली इस यात्रा में श्रद्धालुओं को कई बार दिनभर भूखा-प्यासा रहकर पैदल ही सफर तय करना होता है. लेकिन फिर भी मां के भक्त पीछे नहीं हटते. इस यात्रा की एक अनोखी परंपरा भी है. यात्रा शुरू करने से पहले दो शपथें ली जाती हैं. पहली, कि जब तक मां के दर्शन न हो जाएं, तब तक सांसारिक मोह से दूरी बनाई जाए. दूसरी, कि अपनी सुराही का पानी किसी और को नहीं दिया जाएगा, चाहे कोई प्यास से क्यों न तड़प रहा हो. यह परंपरा मां के प्रति समर्पण और अनुशासन की मिसाल मानी जाती है.

मुस्लिम के लिए नानी का मंदिर 

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पाकिस्तान के बलूच और सिंध क्षेत्रों के मुस्लिमों के लिए यह मंदिर "नानी का मंदिर" है. उनके अनुसार, मां हिंगलाज कोई देवी नहीं बल्कि एक संत समान शक्ति हैं, जिनकी कृपा से जीवन में सुख-शांति मिलती है. यही वजह है कि अफगानिस्तान, ईरान, मिस्र और पाकिस्तान के कई मुस्लिम समुदाय हर साल यहां आकर फूल, अगरबत्ती और इस्त्र चढ़ाते हैं. वे मां को "नानी पीर" कहकर याद करते हैं और उनकी दरगाह की तरह सेवा करते हैं. यहां जो महिलाएं दर्शन करती हैं, उन्हें “हाजियानी” कहा जाता है. यह नाम इस बात को दर्शाता है कि वे धार्मिक दृष्टि से एक पवित्र यात्रा पूरी करके लौटी हैं.

हिंगलाज माता की कहानी

हिंगलाज माता को देवी भगवती का स्वरूप माना जाता है. मान्यता है कि जब माता सती ने यज्ञ में अपने पिता द्वारा भगवान शिव का अपमान सुना, तो उन्होंने हवनकुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए. इस घटना से व्यथित होकर भगवान शिव ने उनका शरीर उठाकर तांडव शुरू कर दिया. ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित किया. जहां-जहां ये अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने. माना जाता है कि हिंगलाज में सती का सिर गिरा था, इसलिए यह शक्तिपीठ विशेष रूप से पूजनीय और चमत्कारी माना जाता है.

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नाम और इतिहास की कथा

हिंगलाज नाम की उत्पत्ति भी एक दिलचस्प कथा से जुड़ी है. मान्यता है कि कभी इस क्षेत्र पर हिंगोल नाम का एक राज्य हुआ करता था और उसके राजा हंगोल ने राज्य को अपनी शक्ति से चलाया. परंतु दरबारियों की चालों से वह बुराई की राह पर चला गया. तब प्रजा ने मां भगवती से राजा को सुधारने की प्रार्थना की. मां ने उस स्थान पर प्रकट होकर राजा को सुधारा और तभी से यह स्थान हिंगलाज कहलाने लगा. यह कहानी सिर्फ नाम की नहीं, बल्कि उस शक्ति की भी है जो अन्याय और अंधकार को मिटा देती है.

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बताते चलें कि हिंगलाज माता का शक्तिपीठ एक चमत्कारी स्थल होने के साथ-साथ भारत-पाक के बीच छिपी मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक भी है. यह मंदिर उस वक्त और खास हो जाता है जब पूरी दुनिया धार्मिक कट्टरता से जूझ रही होती है. यहां न कोई हिंदू है न मुस्लिम, बस होते हैं तो श्रद्धालु. मां हिंगलाज का यह मंदिर दिखाता है कि जब आस्था सच्ची हो, तो न धर्म दीवार बनता है, न सीमा. यह मंदिर नहीं, एक संदेश है जहां प्रेम है, वहीं परमात्मा है.

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