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Janmashtami: समुद्र में ऐसे खोजी गई थी श्री कृष्ण की द्वारका नगरी

कहते हैं कि भारत अपने भीतर कई राज समेटे हुए है, और उससे सटे समंदर कुछ ऐसे रहस्य उजागर करते हैं, जो वक्त-वक्त पर सबको चौंका देते हैं। साल 1970 में वायुसेना के एक अभियान ने एक ऐसे ही रहस्य से पर्दा उठाया, जब उन्होंने समुद्र के भीतर प्राचीन द्वारका नगरी के अवशेष खोज निकाले।

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भारत में समय-समय पर कुछ ऐसी घटनाएं घटित होती रही हैं, जो हमें हमारी प्राचीन सभ्यताओं और शहरों के बारे में दोबारा सोचने पर मजबूर कर देती है। अब कुछ ऐसा ही हुआ साल 1970 में, जब वायुसेना के जवानों ने समुद्र के ऊपर हवाई गश्त करते वक्त कुछ ऐसा देखा जिसने सबके होश उड़ा दिए।

अब आपने ये तो अक्सर सुना ही होगा कि समुंद्र के अंदर आज भी कई साइट्स दबी हुई हैं। इनमे से ही एक थी श्री कृष्ण की द्वारका नगरी। जिनके बारे में किसी को ज्यादा कुछ नहीं पता और शायद पता भी नहीं चलता, अगर वायू सेना समुद्र के ऊपर से उड़ान भरते हुए कुछ नोटिस नहीं करती। अब आपको हम पहले खोजी गई द्वारका नगरी के बारे में बताएं, उससे पहले आपको द्वापर युग में लेकर चेलते हैं, जहां द्वारका में कृष्ण ने अपने 36 साल बिताए, और फिर इस नगरी का विनाश हो गया, ये जलमगन हो गई।

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द्वापर युग, ये वही युग था जब महाभारत का युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध के समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण द्वारका नगरी को लौट आए, उन्होंने इसे रहने के लिए चुना था। लेकिन गांधारी के श्राप के कारण ठीक 36 साल बाद श्री कृष्ण के वंश के साथ साथ उनकी द्वारका नगरी का भी विनाश हो गया था। उसके बाद उस नगरी का क्या हुआ, वो कहा विलुप्त हो गई, इस बारे में ज्यादातर लोग नहीं जानते थे। लेकिन द्वारका निगरी के प्रमाण समय समय पर मिलता रहा।

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अब बात करते हैं वायू सेना द्वारा खोजी गई द्वारका नगरी की तरफ, जिसे खोजने की शुरुआत आकाश से वायुसेना ने की थी, और फिर उसकी सचाई भारतीय नौसेना ने सफलतापूर्वक उजागर की। द्वारिका नगरी को तब तक एक काल्‍पनिक नगर ही कहा जाता था, लेकिन इस कल्‍पना को सच साबित कर दिखाया प्रो. राव ने। प्रो. SR राव एक ऑर्कियोलॉजिस्‍ट रहे, प्रो. राव और उनकी टीम ने साल 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका की दीवार की खोज की। उन्‍हें इस द्वारका में उस समय के बर्तन भी मिले, जो कुछ 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के थे। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्‍यता के भी कई अवशेष इस खोज में उनके हाथ लगे।

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लेकिन क्या आपको पता है 2001 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशिनोग्राफी के छात्रों ने खम्भात की खाड़ी में प्रदूषण की जांच करते हुए कुछ छात्रों को एक प्राचीन शहर के अवशेष मिले। ये शहर लगभग 5 मील तक फैला हुआ था और इसमें तांबे और कांसे के सिक्के, इमारतों के तराशे स्तंभ और अन्य कलाकृतियां मिलीं। मोटे तौर पर इन्हें 3,600 साल पुराना माना गया। लेकिन ये कितने पूराने है इसे जांचने के लिए इसके कुछ नमूने मणिपुर और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी भेजे गए। वहां कार्बन डेटिंग तकनीक से पता चला कि कुछ नमूने 9 हजार साल पुराने हैं.

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इसके बाद, 2005 और 2007 में भारतीय नौसेना और पुरातत्व विभाग के संयुक्त प्रयास से द्वारका नगरी के और भी अवशेष मिले। उन्होंने ऐसे नमूने इक्टठा किए जिसे देखकर हर कोई चौंक गया। 2005 में नौसेना के सहयोग से प्राचीन द्वारिका नगरी से जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने मिलें।

अब जो भगवान कृष्ण कम मानते थे, इस खोज ने उनके अस्तित्व की, एक सच्ची कहानी दुनिया के आगे रखी है। ऐसे में द्वारका नगरी के समुद्र में डूब जाने की थ्योरी भी कही न कही सच लगती है। लेकिन आप द्वारका नगरी के बारे में क्या सोचते हैं हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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