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अमेरिका में प्रभु जगन्नाथ का अपमान, क्या PM मोदी के रहते ISKCON के ख़िलाफ़ चल रही बड़ी साज़िश ?

अब जब इसी जगन्नाथ पुरी धाम से इस्कॉन पर बैन लगाने की माँग उठी है, तो पीएम मोदी सबसे ज़्यादा अचंभित हैं। सवाल उठने लगे हैं कि क्या पीएम मोदी के रहते इस्कॉन को भारत से उखाड़ फैंका जाएगा ? अमेरिकी ज़मीन पर आख़िर किसने प्रभु जगन्नाथ को अपमानित किया है ? अब क्या भारत से इस्कॉन की जड़े काट दी जाएगी ? इस पूरे मामले का सच क्या है, आईये आपको बताते हैं।

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प्रभु जगन्नाथ के प्रति देश के कर्मशील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आस्था किसी से छिपी नहीं है, बतौर संघ प्रचारक एक लंबा समय उन्होंने जगन्नाथ पुरी धाम में बिताया। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी जी हर साल निकाली जाने वाली जगन्नाथ यात्रा में शामिल होते और जब देश की सत्ता सँभाली , प्रधानमंत्री बनते ही ओड़िसा जाकर नाथों के नाथ प्रभु जगन्नाथ के आगे नतमस्तक हुए। ऐसा नहीं है कि ये भक्ति प्रेम सिर्फ़ एक तरफ़ा है, भक्त की एक पुकार पर प्रभु जगन्नाथ ने ओड़िसा में कमल खिला दिया…24 साल बाद पटनायक की सरकार को दरकिनार कर जनता ने भाजपा को चुना। फिर उसके बाद ख़ज़ाने की गायब हुई चाबी भी मिल गई और रत्न भंडार के दरवाज़े भी खुल गये और अब जब इसी जगन्नाथ पुरी धाम से इस्कॉन पर बैन लगाने की माँग उठी है, तो पीएम मोदी सबसे ज़्यादा अचंभित हैं। सवाल उठने लगे हैं कि क्या पीएम मोदी के रहते इस्कॉन को भारत से उखाड़ फैंका जाएगा ? अमेरिकी ज़मीन पर आख़िर किसने प्रभु जगन्नाथ को अपमानित किया है ? अब क्या भारत से इस्कॉन की जड़े काट दी जाएगी ? इस पूरे मामले का सच क्या है, आईये आपको बताते हैं। 

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अमेरिका के न्यूयार्क शहर में 1966 में स्वामी प्रभुपाद ने इस्कॉन की नींव रखी, तभी से भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य संदेशों को पश्चिमी देशों में फैलाया जा रहा है। आज देखिये दुनियाभर में इस्कॉन के ढेरों मंदिर हैं, अकेले भारत में 400 इस्कॉन मंदिर हैं। यहाँ तक की पाकिस्तान की ज़मीन पर आपको इस्कॉन मंदिर के दर्शन हो जाएँगे। इस्कॉन के प्रति पीएम मोदी की आस्था कितनी गहरी रही है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाइये 2019 में दिल्ली मेट्रो की सवारी से पीएम मोदी इस्कॉन मंदिर पहुँचे थे..यहाँ उन्होंने 800 किलो के 670 पृष्ठों वाली विशाल गीता का विमोचन किया था। इस बात को स्वीकारा था कि आज दुनिया भर के विभिन्न देशों में सैकड़ों इस्कॉन मंदिर हैं, जो भारतीय संस्कृति का प्रसार कर रहे हैं। बकायदा भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की 125वीं जयंती के मौक़े पर 125 रुपये का एक विशेष स्मारक सिक्का भी जारी किया था और अब जब भारत की धरती से इस्कॉन पर बैन लगाने की माँग पुरी पीठ से उठी है, तो हर कोई अचंभित है लेकिन इसके पीछे की वजह है। पहले आप वो जान लीजिये। इसी महीने की 9 नवंबर की तारीख़ जगह अमेरिका का ह्यूस्टन शहर जहां इस्कॉन द्वारा रथ यात्रा निकाली गई, गोवर्धन मठ की इजाज़ के बग़ैर प्रभु जगन्नाथ की यात्रा को इस्कॉन ने आयोजित करवाई। ना ही प्रभु जगन्नाथ की स्नान यात्रा का समय है और ना ही उनकी रथ यात्रा का समय है यानी की भारत से बाहर असामयिक रथ यात्रा निकाली गई और सबसे बड़ी बात ये कि इसी प्रतिकृति परेड में ना ही प्रभु जगन्नाथ, ना ही देवी  सुभद्रा की और ना ही भाई बलभद्र की कोई प्रतिमा इस यात्रा में मौजूद थी..यहाँ तक सुदर्शन चक्र की मूर्तियों को भी शामिल नहीं किया गया। जो की पूरी तरह से शास्त्रों का उल्लंघन है। प्रभु जगन्नाथ का अपमान है..यहाँ तक जगन्नाथपुरी धाम की परंपरा के विरुद्ध है। इसी को लेकर जगन्नाथ मंदिर के सेवादारों से लेकर प्रशासन ने इस्कॉन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और गोवर्धन मठ से इस्कॉन पर बैन लगाने की माँग की गई है। हालाँकि इस पूरे मसले पर अब इस्कॉन की भी प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है, संस्था की वेबसाइट पर एक बयान अपलोड किया गया है, जिसमें ये कहा गया है ।

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हम पहले देवताओं के साथ रथ यात्रा का आयोजन करना चाहते थे. लेकिन स्थानीय समुदाय के कुछ लोगों ने चिंता जताई. इसके बाद योजना में बदलाव किया गया. हमारे उत्सव का मकसद लोगों को भगवान जगन्नाथ के दर्शन का मौका देना था। इस मसले पर हम पुरी के अधिकारियों के साथ बैठक करेंगे। ऐसा नहीं है कि इस्कॉन से जुड़ा ये पहला विवाद है, धर्म के नाम पर ब्रेन वाश करने का आरोप इस्कॉन पर लगता है, इस्कॉन को कमाई का अड्डा भी कहा जाता है..ये आरोप लगता है कि इस्कॉन का सारा चढ़ावा अमेरिका जाता है हालाँकि इन आरोपों की सत्यता तक आज भी कोई नहीं पहुँच पाया है।फ़िलहाल भारत से इस्कॉन पर बैन लगाने की माँग कितनी उचित है । 

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