Advertisement

Loading Ad...

नाथ संप्रदाय से ताल्लुक रखने वाले योगी बाबा को कैसे दी जाएगी मुक्ति ?

लाखों की तादाद में नाथ संप्रदाय को मानने वाले लोग इन विदेशों धरती पर बसे हैं और आज जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में कल का मोदी देखा जाने लगा है, तो नाथ संप्रदाय का डंका विश्व पटल पर बजना शुरु हो गया। ऐसे में नाथ संप्रदाय जिनकी पहचान है, उनके अंतिम समय की तस्वीर क्या कहती है ?

Loading Ad...

क्या अमेरिका, क्या जर्मनी, क्या ब्रिटेन और क्या पाकिस्तान, भारत के पड़ोसी मुल्कों से लेकर यूरोप की दुनिया में मठाधीश योगी बाबा की जय-जयकार चारों तरफ़ है। अब अगर आप इस जय-जयकार की वजह पूछेंगे तो कारण नाथ संप्रदाय है।क्योंकि योगी जी जिस नाथ संप्रदाय से आते हैं। उसी नाथ संप्रदाय का भौकाल विदेशी धरती पर गहराई से क़ायम है। नाथ संप्रदाय की जड़ें सिर्फ़ भारत की सीमा तक की सीमित नहीं है, बल्कि इस संप्रदाय के मठ पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान, काबुल, तिब्बत और म्यांमार से लेकर अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन में भी मौजूद है। इन्ही मठों से इन देशों में रहने वाली जनता जुड़ी हुई है। लाखों की तादाद में नाथ संप्रदाय को मानने वाले लोग इन विदेशों धरती पर बसे  हैं और आज जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में कल का मोदी देखा जाने लगा है, तो नाथ संप्रदाय का डंका विश्व पटल पर बजना शुरु हो गया। ऐसे में नाथ संप्रदाय जिनकी पहचान है, उनके अंतिम समय की तस्वीर क्या कहती है ? 

Loading Ad...

नाथ पंथ की नींव जटाधारी और त्रिलोक के स्वामी भगवान शिव ने रखी और फिर गोरखनाथ ने इस परंपरा को अपने शिष्यों तक पहुँचाई। उन्होंने बारह पंथी मार्ग प्रशस्त किया, जो आगे चलकर नाथ संप्रदाय कहलाया..इसी परंपरा से आने वाले लोग आज भी अपने नाम के पीछे नाथ शब्द लगाते हैं, ताज़ा उदाहरण योगी आदित्यनाथ हैं। जब यही योगी एक दूसरे से मिलते हैं, तो नमस्कार की जगह आदेश बोलते हैं। जिसका मतलब होता है आ से आत्मा , द से देवता और श से संत..यानी आप में मौजूद संत को प्रणाम आज भी नाथ पंथ मे दीक्षित करने के लिए योगियों की दीक्षा से लेकर पूजा-पाठ और अंतिम संस्कार गोपनीय है। 

Loading Ad...


आपको ये जानकर हैरानी होगी कि नाथ संप्रदाय से तभी जुड़ा जा सकता है, जब तक आप ख़ुद को पूरी तरह से इस परंपरा से जोड़ते नहीं है। इसके लिए 13 वर्षों की कड़ी तपस्या से गुजरना पड़ता है..एक लंबा समय एकांतवास में बिताना होता है। खानपान पर गहरा नियंत्रण रहता है. दीक्षा के दौरान लोग योग और अग्नि से खुद को पवित्र बनाते हैं. यही वजह है कि इससे जुड़े लोगों का दाह संस्कार नहीं होता. योगी को बिना सिले और भगवा कपड़े पहनने होते हैं, हालांकि अब सिले हुए वस्त्र भी चलन में हैं। कर्ण छेदन , इस संप्रदाय की एक खास रीति है। ये कान में सामान्य पियर्सिंग की तरह नहीं होती, बल्कि तकलीफ देने वाली होती है. गुरु गोरखनाथ ने अपने शिष्यों के लिए एक तरह से ये परीक्षा ही रखी, जिसमें पास होने पर कोई नाथ संप्रदाय में शामिल कहलाता. लंबी परीक्षा के बाद ही कर्ण छेदन होता है। 

Loading Ad...


यह भी पढ़ें

इस दौरान कोई इलाज भी नहीं दिया जाता और 40 दिन एकांत में बिताने होते हैं. माना जाता है कि लंबे अकेलेपन और लगातार प्रार्थना के साथ ही योगी का संसार से मोह खत्म हो जाता है. इसके बाद भी कई रस्में होती हैं, जिसके बाद कोई पूरी तरह से संप्रदाय का हिस्सा बन जाता है। इन तमाम परिक्षाओं से गुजरकर ही अजय सिंह बिष्ट आज के योगी आदित्यनाथ बन पाए। इन्हीं कारणों के चलते अपनी जीवित अवस्था में योगी जी चाहे तो भू समाधी ले सकते है या फिर मृत्यु उपरांत उन्हें जल समाधी दी जा सकती है। दरअसल नाथ संप्रदाय से जुड़ने वाले प्रक्येक संत के लिए यही माना जाता है कि उस पंथ में मांसाहार और दूसरे तामसी गुण वाले भोजन का निषेध है। इनका शरीर पहले से ही पवित्र होता है, जिस कारण इनका देह दान यानी की अंतिम संस्कार नहीं किया जाता है। साफ़ शब्दों में समझाए, तो नाथ संत जलाए नहीं जाते हैं। इन्हें समाधी दी जाती है, फिर चाहे वो योगी जी हो या फिर कोई और नाथ संत।अपने ख़ुद के संप्रदाय के बारे में योगी जी क्या सोचते हैं। 

अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...
Loading Ad...
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...