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शुक्रवार व्रत: ऐसे करें मां लक्ष्मी, संतोषी और शुक्र देव की पूजा, दूर होंगे कष्ट और मिलेगी सुख-समृद्धि

शुक्रवार के दिन विधि-विधान से पूजा करने पर सभी कष्ट दूर होते हैं और माता रानी भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं. ज्योतिष शास्त्र में यह व्रत शुक्र ग्रह को मजबूत करने और उससे जुड़े दोषों को दूर करने के लिए भी रखा जाता है.

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मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि शुक्रवार को विडाल योग का संयोग बन रहा है. इस दिन सूर्य तुला राशि और चंद्रमा 15 नवंबर सुबह 3 बजकर 51 मिनट तक सिंह राशि में रहेंगे. इसके बाद कन्या राशि में गोचर करेंगे. 

इस दिन रख सकते हैं शुक्रवार का व्रत

द्रिक पंचांग के अनुसार, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 27 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय सुबह 10 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 5 मिनट तक रहेगा. इस तिथि को कोई विशेष पर्व नहीं है, लेकिन आप वार के हिसाब से शुक्रवार व्रत रख सकते हैं.

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कब बनता है विडाल योग?

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, विडाल योग एक अशुभ योग होता है. यह विशेष रूप से तब बनता है जब चंद्रमा कुछ विशेष नक्षत्रों में स्थित होता है. साथ ही, यह जातक के जीवन में समस्याएं, विघ्न, मानसिक अशांति, रोग या अचानक आने वाली कठिनाइयां पैदा कर सकता है. यह विशेष रूप से तब बनता है जब चंद्रमा कुछ विशेष नक्षत्रों में स्थित होता है.

शुक्रवार व्रत रखने से क्या लाभ मिलता है?

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ब्रह्मवैवर्त और मत्स्य पुराण में शुक्रवार व्रत का उल्लेख मिलता है, जिसमें माता लक्ष्मी, संतोषी और शुक्र ग्रह की अराधना करने के लिए बताया गया है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस तिथि पर विधि-विधान से पूजा करने से जातक के जीवन में सुख, समृद्धि, धन-धान्य और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है.

क्यों रखा है जाता है शुक्रवार का व्रत?

इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर सभी कष्ट दूर होते हैं और माता रानी भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं. ज्योतिष शास्त्र में यह व्रत शुक्र ग्रह को मजबूत करने और उससे जुड़े दोषों को दूर करने के लिए भी रखा जाता है. 

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कब से शुक्रवार का व्रत रखना शुरू करें 

अगर कोई भी जातक व्रत को शुरू करना चाहता है, तो किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार से कर सकता है. आमतौर पर 16 शुक्रवार तक व्रत रखने के बाद उद्यापन किया जाता है. 

विधि-विधान से करें पूजा

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सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें. पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़कें. लाल कपड़े पर माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. दीप जलाएं और फूल, चंदन, अक्षत, कुमकुम और मिठाई का भोग लगाएं.

इन मंत्रों का जप करें

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‘श्री सूक्त’ और ‘कनकधारा स्तोत्र’ का पाठ करें. मंत्र जप करें, 'ऊं श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः' और 'विष्णुप्रियाय नमः' का जप भी लाभकारी है. 

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