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आस्था या चमत्कार? एक मुसलमान के लिए हर बार क्यों रुकती है जगन्नाथ रथयात्रा...चौंकाने वाला कारण!
सालबेग की इस असीम भक्ति को सम्मान देने के लिए, हर साल जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथ सालबेग की मजार के सामने कुछ देर के लिए अवश्य रुकते हैं. यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि सच्ची आस्था मन की पवित्रता में निहित है, न कि किसी बाहरी पहचान में, और यही वजह है कि यह आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है.
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पुरी, ओडिशा की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक अनूठी परंपरा का प्रतीक है जो अनेकता में एकता और भक्ति की सार्वभौमिकता का संदेश देती है. लाखों भक्तों की भीड़ के बीच जब भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के विशाल रथ भव्यता से आगे बढ़ते हैं, तो एक विशेष स्थान पर वे कुछ देर के लिए रुक जाते हैं – यह स्थान है एक मुस्लिम संत, भक्त सालबेग की मजार. यह ठहराव कई लोगों के लिए कौतूहल का विषय है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी आस्था से जुड़ी कहानी है.
कौन थे भक्त सालबेग?
सालबेग भगवान जगन्नाथ के विशेष भक्त थे. उनके पिता एक मुगल सेनापति थे और माता एक हिंदू थीं. सालबेग स्वयं इस्लाम धर्म को मानते थे, लेकिन उनके हृदय में भगवान जगन्नाथ के प्रति असीम श्रद्धा थी. भगवान जगन्नाथ की महिमा के बारे में सुनकर वो उनके दर्शन करने के लिए पहुंचे लेकिन मुस्लिम होने की वजह से सालबेग को मंदिर में प्रवेश करने नहीं दिया गया. हालांकि, इसके बाद भी उनकी भक्ति कम नहीं हुई और वे भगवान जगन्नाथ का नाम जपते रहे और उनके भजन और कीर्तन गाते रहे.
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मजार पर रथ के रुकने की पौराणिक कथा
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यह मान्यता है कि एक बार जब जगन्नाथ रथ यात्रा निकल रही थी, तब सालबेग बहुत बीमार थे और पुरी मंदिर तक पहुँचने में असमर्थ थे. वे भगवान के दर्शन करना चाहते थे, लेकिन उनके लिए रथ यात्रा तक पहुँच पाना मुश्किल था. चूंकि वह मुस्लिम थे, इसलिए उन्हें मंदिर के अंदर जाने की अनुमति भी नहीं थी.
धार्मिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ का रथ सालबेग की कुटिया के सामने पहुंचा, तो वह अचानक रुक गया. रथ को आगे बढ़ाने के लिए लाख कोशिशें की गईं, लेकिन वह एक इंच भी नहीं हिला. सभी लोग हैरान और परेशान थे.
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तब मंदिर के मुख्य पुजारी को एक सपना आया, जिसमें भगवान जगन्नाथ ने उन्हें बताया कि वे अपने प्रिय भक्त सालबेग का इंतजार कर रहे हैं. भगवान ने यह भी संदेश दिया कि उनकी भक्ति किसी धर्म या जाति की मोहताज नहीं है.
कुछ मान्यताओं के अनुसार, जब सालबेग स्वस्थ हुए और उन्होंने रथ पर विराजमान भगवान के दर्शन किए, तभी जाकर रथ आगे बढ़ पाया. कुछ कथाओं में यह भी कहा गया है कि रथ करीब सात दिनों तक वहीं रुका रहा और इस दौरान सभी धार्मिक अनुष्ठान रथ पर ही संपन्न किए गए, जब तक कि सालबेग दर्शन के लिए नहीं आ गए.
भक्ति और सद्भाव का प्रतीक
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सालबेग की इस असीम भक्ति को सम्मान देने के लिए, हर साल जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथ सालबेग की मजार के सामने कुछ देर के लिए अवश्य रुकते हैं. यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि सच्ची आस्था मन की पवित्रता में निहित है, न कि किसी बाहरी पहचान में, और यही वजह है कि यह आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है.