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इस्लामिक देश में छिपे इस मंदिर के रहस्यों को सुलझाने में वैज्ञानिक भी हुए फेल
वैसे तो माना जाता है कि भारत में ही सबसे ज्यादा और पुराने मंदिर हैं, जो आज तक दुनिया के लिए एक रहस्य बने हुए हैं। वहीं विश्व का सबसे पुराना एक ऐसा मंदिर है, जिसके बारे में आज तक कोई पता नहीं लगा पाया कि यह किस धर्म को समर्पित है, किस धर्म के देवता की यहां पूजा की जाती है.
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भारत हमेशा से ही अध्यात्म का अनोखा संगम रहा है, इसी पावन धरा पर भगवान राम ने जन्म लिया, इसी धरा पर कृष्ण ने अर्जुन को गीता का सार समझाया और इसी धरा पर महर्षियों ने अनेकों मंदिरों का निर्माण कराया. इसलिए भारत में आज भी कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जो कई वर्षों से पुराने हैं, कई वर्षों से आज भी सीना ताने ज्यों के त्यों खड़े हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं विश्व का सबसे पुराना मंदिर कहां पर स्थित? ये मंदिर कब, कैसे और किसने बनवाया और सबसे बड़ी बात कि किसके लिये बनवाया ?
भारत हमेशा से ही अध्यात्म का केंद्र रहा है. हमेशा से ही भारत में कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, कई मंदिरों का निर्माण कराया है. इसलिए यहां क़रीब 6,48,907 अलग-अलग बेहद ही पुराने मंदिर हैं. लेकिन इन सभी मंदिरों में सबसे पुराना, विश्व का पहला मंदिर बना है तुर्की में, शायद ये सुनकर आपको अजीब लगे क्योंकि तुर्की एक इस्लामिक देश है जहां तक़रीबन 99.8% की आबादी में मुस्लिम लोग रहते हैं. इसका कारण है कि इस आंकड़े में वे लोग भी शामिल हैं जिनके माता-पिता किसी भी मान्यता प्राप्त धर्म में नहीं थे, इसलिए इसे एक इस्लामिक देश के रूप में देखा जाता है लेकिन इसी इस्लामिक देश में बना है विश्व का सबसे पुराना मंदिर जिसे गोबेकली टेपे मंदिर के नाम से जाना जाता है.
आख़िर कब, कैसे और किसने करवाया इस प्राचीन मंदिर का निर्माण?
विश्व का सबसे पुराना मंदिर गोबेकली टेपे मंदिर दक्षिण-पूर्वी तुर्की के प्राचीन शाही उरफा से तक़रीबन छह मील की दूरी पर स्थित है. पुरातत्वविदों के अनुसार यह मंदिर तक़रीबन 11,600 साल पुराना है. यह मंदिर इतना पुराना है कि जब धरती पर धातु और मिट्टी के बर्तनों का भी आविष्कार नहीं हुआ था, तब इस मंदिर को बनाया गया. इसके अलावा आपको बता दें कि इस मंदिर ने नवपाषाण क्रांति को ही हिला कर रख दिया है क्योंकि अब तक माना जाता था कि पहले इंसानों ने खेती करना सीखा, उसके बाद गांव और शहरों का निर्माण किया गया था. लेकिन हैरानी वाली बात तो यह है कि गोबेकली टेपे नाम के इस मंदिर ने लोगों को हिला कर रख दिया. न तो इस मंदिर के पास वाली जगह पर किसी भी तरह से खेती के निशान नहीं मिले बल्कि एक प्राचीन आध्यात्मिक ढांचा मिला. हालांकि इस बात का पता नहीं चल पाया है कि यह मंदिर किस धर्म को समर्पित है, लेकिन इस पर पहली बार निरीक्षण 1963 में किया गया था. वहीं बर्लिन के जर्मन पुरातत्वविद क्लाउस श्मिट ने इस जगह को समझने के लिये खुदाई शुरू की और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई. लेकिन खुदाई का कार्य जारी रहा और खुदाई करते समय इस जगह से पुरातत्वविद को पत्थर के आकार का जानवर का सिर मिला, सुअर की मूर्ति मिली जो कि पत्थरों से बनी थी. लेकिन क्लाउस श्मिट ने अपनी मृत्यु से पहले इस जगह के बारे में क्या कहा, सुनिए. हमारे पास बहुत सारी समकालीन साइटें हैं जहां पर शिकारी और भोजन इकट्ठा करके जीवन को जीने वाले लोग पूजा करने आते थे. लेकिन यह कोई नहीं जानता कि यहां पर कौन से भगवान या धर्म की पूजा की जाती थी। लेकिन इस मंदिर पर इटली के मिलान के पुरातत्वविद गिउलिओ मैगली ने इस मंदिर के कई रहस्यों को जानने के लिए रात के समय में चाँद और तारों का अध्ययन करने के लिए आसमान की ओर देखा तो ब्रिटेन की स्टोनहेंज जगह के बारे में सोचा क्योंकि वहां भी पत्थरों से बने खंभे ऐसे ही रखे गये थे, जिन्हें देखने से पता चलता है कि जैसे ये खंभे भी आसमान के सूर्य और तारों को देखने के लिये बनाए गए हों और इसलिए उनका मानना है कि पहले के समय में लोग चाँद या तारों की पूजा करते थे, इसी वजह से ऐसे पत्थरों का निर्माण किया गया हो. हालांकि इस बात का पता नहीं लगाया जा सकता कि असल में लोग यहां किस धर्म को मानते थे, किस धर्म के भगवान की पूजा करते थे.
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