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क्या आप जानते हैं, क्यों केतकी का फूल शिवलिंग पर नहीं किया जाता अर्पित ?

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भक्तजन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग चढ़ाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि केतकी के फूल को शिव पूजा में वर्जित क्यों माना गया है? इसके पीछे एक पौराणिक कथा छिपी है। शिवपुराण के अनुसार, एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता की लड़ाई हुई, जिसे सुलझाने के लिए भगवान शिव ने स्वयं को एक विशाल अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट किया।

क्या आप जानते हैं, क्यों केतकी का फूल शिवलिंग पर नहीं किया जाता अर्पित ?
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महाशिवरात्रि का पर्व पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन भगवान शिव की पूजा करते हैं, जलाभिषेक करते हैं, बेलपत्र, धतूरा, भांग और अनेक फूल चढ़ाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतनी विविधता के बावजूद शिव पूजा में केतकी के फूल को क्यों निषेध माना गया है? आखिर ऐसा क्या हुआ था कि स्वयं भोलेनाथ ने इस सुंदर और सुगंधित फूल को अपने पूजन से वंचित कर दिया?  इसके पीछे छिपी है एक रोचक पौराणिक कथा, आइए जानते है इसके बारे में विस्तार से। 
जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच छिड़ा था विवाद
शिव पुराण के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच श्रेष्ठता को लेकर घोर विवाद छिड़ गया। दोनों देवता स्वयं को सर्वोच्च सिद्ध करने में लगे थे। ब्रह्माजी, जो सृष्टि के रचयिता थे, स्वयं को सबसे महान मानते थे, जबकि विष्णु जी, जो पालनहार थे, अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि समझते थे। जब यह विवाद बढ़ने लगा, तब सभी देवताओं ने भगवान शिव से इसका समाधान करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने इस विवाद को सुलझाने के लिए एक अनोखी परीक्षा ली। उन्होंने स्वयं को एक विशाल अग्निस्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट किया, जो आकाश से लेकर पाताल तक फैला हुआ था। यह अग्निस्तंभ इतना विशाल था कि इसका न आदि दिख रहा था, न अंत। तब शिव ने दोनों देवताओं से कहा कि जो इस ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत खोजकर आएगा, वही सबसे महान माना जाएगा।
विष्णु ने स्वीकार की हार, ब्रह्मा ने किया छल
इस चुनौती को स्वीकार करते हुए भगवान विष्णु वराह (सूअर) का रूप धारण कर पृथ्वी के गर्भ में चले गए ताकि ज्योतिर्लिंग का आधार खोज सकें। वे नीचे-नीचे गहराइयों में उतरते गए, लेकिन उन्हें इसका कोई अंत नहीं मिला। आखिरी में उन्होंने अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली और वापस लौट आए। वही दूसरी ओर, ब्रह्माजी हंस का रूप धारण कर आकाश की ओर उड़ चले ताकि ज्योतिर्लिंग का अंत खोज सकें। वे लगातार ऊपर उड़ते रहे, लेकिन उन्हें भी इसका कोई अंत नहीं मिला। परंतु विष्णु जी के विपरीत, ब्रह्माजी ने अपनी हार स्वीकार करने के बजाय एक कपटपूर्ण उपाय सोचा। उड़ान भरते समय ब्रह्माजी को केतकी का एक फूल मिला, जो बहुत समय से वहां गिरा हुआ था। ब्रह्माजी को एक युक्ति सूझी। उन्होंने केतकी के फूल से कहा, "यदि तुम मेरे पक्ष में झूठी गवाही दोगे कि मैंने ज्योतिर्लिंग का अंत देख लिया है, तो मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगा और तुम्हारी पूजा हर स्थान पर होगी।" केतकी का फूल इस प्रस्ताव से प्रसन्न हो गया और झूठ बोलने के लिए तैयार हो गया। दोनों शिव के पास पहुंचे और ब्रह्माजी ने कहा, "मैंने इस अग्निस्तंभ का अंत देख लिया है, और इस केतकी के फूल ने स्वयं इसका प्रमाण दिया है।"
भगवान शिव सर्वज्ञ हैं। वे सत्य और असत्य का भेद तुरंत समझ गए। इसलिए ब्रह्मा जी के झूठ से वो अत्यंत क्रोधित हो उठे। ब्रह्माजी के छल और केतकी के झूठे समर्थन से शिव इतने रुष्ट हुए कि उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दे दिया, "आज से तुम्हारी कोई पूजा नहीं करेगा। संसार में सभी देवताओं की पूजा होगी, परंतु तुम्हारी आराधना कोई नहीं करेगा।" इसके बाद शिव ने केतकी के फूल की ओर देखा और कहा, "तुमने भी झूठ का साथ दिया है। इसलिए आज से तुम मेरे पूजन के योग्य नहीं रहोगे। कोई भी भक्त तुम्हें मेरी पूजा में अर्पित नहीं करेगा।"
भगवान शिव के इस श्राप के कारण ही ब्रह्माजी की पूजा आज भी बड़े स्तर पर नहीं होती। देशभर में विष्णु, शिव, देवी, गणेश, हनुमान की पूजा होती है, लेकिन ब्रह्मा जी के मंदिर गिने-चुने ही हैं। पुष्कर (राजस्थान) में स्थित ब्रह्मा मंदिर को छोड़कर कहीं भी उनकी पूजा विधिपूर्वक नहीं की जाती। वहीं, शिव की पूजा में केतकी के फूल का निषेध आज भी कायम है। लाखों भक्त महाशिवरात्रि पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, दूध और जल अर्पित करते हैं, लेकिन कोई भी शिवलिंग पर केतकी का फूल नहीं चढ़ाता, क्योंकि यह स्वयं भगवान शिव के श्रापित फूलों में से एक है।
भगवान शिव द्वारा ब्रह्मा और केतकी को दिए गए इस श्राप से यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और छल का अंत निश्चित है। सत्य और ईमानदारी की सदा विजय होती है। भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली, लेकिन ब्रह्मा जी ने झूठ का सहारा लिया, जिसका परिणाम उन्हें आज भी भुगतना पड़ रहा है। 

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