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जन्माष्टमी की रौनक है दही हांडी, नटखट कान्हा की माखन चोरियों से जन्मा ये रंगीन पर्व; दिल छू जाएगी इसकी कहानी

जन्माष्टमी की असली मस्ती तो तब शुरू होती है, जब ऊंची मटकी में भरा माखन, दही और मिश्री तोड़ने के लिए गोविंदाओं की टोली पिरामिड बनाना शुरू करती है। ढोल-ताशों की गूंज, भीड़ का शोर और हवा में तैरता उत्साह… लेकिन क्या इस बार मटकी फूटेगी या आखिरी पल में रह जाएगी अधूरी कोशिश?

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जन्माष्टमी के इस रंगीन और कलेडोस्कोपिक उत्सव की जड़ें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में गहराई से इंटरट्वाइन हैं.कहा जाता है कि बाल्यावस्था में कान्हा को माखन (और अन्य victuals) का बेहद शौक था.वे अपने दोस्तों के साथ एक intricate योजना बनाते और मटकी फोड़कर माखन चुरा लेते.यह नटखट परंपरा ही धीरे-धीरे दही हांडी के रूप में रीइमैजिन्ड हो गई.
 
दही हांडी की शुरुआत कैसे हुई
 
दही हांडी की कहानी भगवान कृष्ण की बचपन की शरारतों से जुड़ी है.बचपन में कान्हा को माखन बहुत पसंद था.वे अपने दोस्तों के साथ घर-घर जाकर माखन और दही चुराते थे.गांव की महिलाएं माखन को ऊंची मटकी में रख देती थीं, ताकि छोटे कान्हा उसे न ले सकें.लेकिन कान्हा दोस्तों के साथ पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुंच जाते और उसे फोड़ देते.यही खेल धीरे-धीरे दही हांडी उत्सव बन गया.
 
अब कैसे मनाया जाता है दही हांडी
  • ऊंचाई पर एक मटकी बांधी जाती है, जिसमें दही, माखन, नारियल और मिश्री रखी जाती है.
  • युवाओं की टीमें, जिन्हें “गोविंदा पथक” कहा जाता है, पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ते हैं.
  • चारों तरफ ढोल-ताशे, डीजे और रंग-बिरंगी सजावट से माहौल उत्सवी बन जाता है.
  • कई जगह इसको प्रतियोगिता के रूप में भी किया जाता है और विजेता टीम को इनाम मिलता है.
इसका महत्व
  • भगवान कृष्ण की लीलाओं को याद करने के लिए मनाया जाता है.
  • यह सिखाता है कि मिलजुलकर मेहनत करने से कोई भी मुश्किल आसान हो सकती है.
  • इसमे मस्ती, खेल और भक्ति तीनों का मेल होता है.
सुरक्षा का ध्यान
  • खिलाड़ियों के लिए हेलमेट और गद्दों का इंतजाम किया जाता है.
  • बच्चों के लिए छोटी ऊंचाई की मटकी रखी जाती है.
  • डॉक्टर और एम्बुलेंस भी मौके पर रखी जाती है.

दुनिया में भी मशहूर

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आज दही हांडी सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि विदेशों में भी मनाई जाती है.अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूके और कई देशों में भारतीय लोग इसे जन्माष्टमी पर बड़े मजे से करते हैं.

दही हांडी एक ऐसा उत्सव है जिसमें भक्ति, मस्ती और रोमांच सब एक साथ देखने को मिलते हैं.कृष्ण की नटखट अदाओं से शुरू हुई यह परंपरा आज राष्ट्रीय स्तर पर एकता, सहयोग और जज़्बे का संदेश देती है.चाहे पिरामिड बनाकर मटकी तोड़ने का साहस हो या “गोविंदा आला रे” की गूंज—दही हांडी हर जन्माष्टमी पर भारत के दिलों में उत्साह भर देती है.
 
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