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नहाय-खाय के साथ छठ महापर्व शुरू…बाजारों में रौनक, घाटों पर बिखरे आस्था और संस्कृति के रंग

छठ पर्व के चार दिन में हर दिन एक खास महत्व रखता है. इस त्योहार को तन ही नहीं मन की शुद्धता का प्रतीक भी माना गया है.

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आस्था के महापर्व छठ की शुरुआत हो गई है. सूर्य देव और छठी मईया को समर्पित इस पर्व के लिए श्रद्धालुओं उत्साह की लहर है. बाजारों में भी रौनक देखते ही बनती है. 25 अक्टूबर यानी आज से शुरू होकर छठ महापर्व 28 अक्टूबर को संपन्न होगा. 

चार दिन तक चलने वाले छठ महापर्व पर देशभर में संस्कृति के रंग बिखरे हैं. बिहार के लोकपर्व छठ की पूजा में मां छठी मईया और सूर्यदेव की अराधना की जाती है. छठ का व्रत महिलाएं संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि, धन धान्य के लिए रखती हैं. 

मन की शुद्धता का त्योहार छठ महापर्व 

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छठ पर्व के चार दिन में हर दिन एक खास महत्व रखता है. शास्त्रों की मानें तो कार्तिक मास में सूर्य अपनी नीच राशि में होता है, इसलिए सूर्यदेव की विशेष पूजा की जाती है. वहीं, छठी मैया को संतान, समृद्धि और परिवार की रक्षा करने वाली देवी माना गया है. इस त्योहार को तन ही नहीं मन की शुद्धता का प्रतीक भी माना गया है. 

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कैसे होती है छठ पूजा, जाने चारों दिनों का महत्व 

महापर्व के पहले दिन छठ व्रती सुबह-सुबह गंगा नदी या किसी भी पवित्र स्थल के जल से स्नान करते हैं. इसके बाद साफ और सादा वस्त्र धारण करते हैं. स्नान के बाद रसोई और पूजा स्थल को साफ किया जाता है. माना जाता है कि छठी मैया स्वच्छता और पवित्रता की प्रतीक हैं. इसलिए इस व्रत में सफाई का खास ध्यान रखा जाता है. इसलिए किसी भी तरह की अशुद्धि नहीं होनी चाहिए. 

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नहाय खाए यानी पहले दिन छठ व्रती एक बार ही भोजन करते हैं. जिसे नहाय-खाय का प्रसाद कहा जाता है. वहीं, खाना कांसे या पीतल के बर्तन में और मिट्टी के चूल्हे पर बनाया जाता है. इसके लिए आम की लकड़ी या गोबर के उपलों का इस्तेमाल किया जाता है. जो कि सात्विक रूप से शुद्ध माने जाते हैं. प्रसाद में आमतौर पर कद्दू की सब्जी, चने की दाल और सादा चावल बनाया जाता है. नहाय-खाय के दिन ही व्रती छठ व्रत का संकल्प लेते हैं. अगले तीन दिनों तक शुद्धता, संयम और भक्ति का पालन करते हैं. 

दूसरा दिन- खरना व्रत 

छठ के दूसरे दिन को खरना कहा जाता है. इसे लोहंडा भी कहा जाता है. खरना में छठ व्रती पूरे दिन अन्न और जल के बिना उपवास रखते हैं, और शाम विशेष प्रसाद बनाकर छठी मैया को अर्पित करते हैं. 

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तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य

छठ पूजा का तीसरा दिन सबसे खास और भव्य माना जाता है. इस दिन ढलते (अस्त) हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे संध्या अर्घ्य या संध्या घाट पूजा भी कहा जाता है. तीसरे दिन यानी सोमवार को कार्तिक शुक्ल षष्ठी पर छठ का प्रसाद तैयार किया जाएगा, जिसमें ठेकुआ, चावल के लड्डू और विभिन्न फल शामिल होंगे. शाम को बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाएगा. इस दिन 36 घंटे का कठिन व्रत रखा जाता है. 

अंतिम दिन- सूर्योदय अर्घ्य

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उगते हुए सूरज को अर्घ्य देने के साछ छठ महापर्व का चौथा दिन प्रांरभ होता है. ये दिन छठ पूजा का सबसे पावन दिन माना जाता है. इसे उषा अर्घ्य और सूर्योदय अर्घ्य कहा जाता है. घाटों पर सूर्यदेव को अर्घ्य देने के साथ ही सभी छठ व्रती इस व्रत का पारण करते हैं. 

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