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चैत्र नवरात्रि 2025: कन्या पूजन में लंगूर को क्यों बिठाया जाता है? जानें धार्मिक रहस्य

चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म में बहुत ही शुभ मानी जाती है, और इसके दौरान कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस पूजा में 9 कन्याओं के साथ एक बालक (लंगूर) को क्यों बिठाया जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस बालक को भगवान भैरव का स्वरूप माना जाता है, जो माता दुर्गा के रक्षक हैं।

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हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है। यह पर्व साल में दो बार आता है—चैत्र और शारदीय नवरात्रि। चैत्र नवरात्रि का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि यह हिंदू नववर्ष की शुरुआत के साथ आता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र माह में ही भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था और इसी माह में ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इस दौरान भक्त पूरे श्रद्धा भाव से देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा और व्रत रखते हैं।

नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्व

नवरात्रि के अंतिम दिन, नवमी तिथि को कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। उन्हें विशेष रूप से भोजन कराया जाता है, चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है और दक्षिणा एवं उपहार देकर सम्मानित किया जाता है। मान्यता है कि कन्या पूजन के बिना नवरात्रि व्रत अधूरा माना जाता है।

कन्या पूजन में लंगूर का महत्व

अक्सर लोग नवमी तिथि के दिन नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी बिठाकर पूजन करते हैं, जिसे ‘लंगूर’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह बालक भैरव बाबा का प्रतीक होता है। भैरव बाबा को माता दुर्गा का रक्षक और उनके पहरेदार के रूप में पूजा जाता है। माता की कृपा प्राप्त करने के लिए भैरव बाबा को प्रसन्न करना आवश्यक माना जाता है। यही कारण है कि कन्या पूजन के दौरान लंगूर (बालक) को भी पूजा जाता है।

कुछ स्थानों पर लोग एक नहीं बल्कि दो बालकों को पूजा में शामिल करते हैं। इनमें से एक को भैरव बाबा का रूप माना जाता है और दूसरे को भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है। चूंकि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी के बिना अधूरी मानी जाती है, इसलिए नवरात्रि के इस पूजन में भी गणेश जी का आह्वान किया जाता है।

लंगूर पूजन की परंपरा कैसे हुई शुरू?

यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि देवी दुर्गा के प्रमुख भक्तों में भैरव बाबा का विशेष स्थान है। माता के अनेक मंदिरों में उनकी मूर्तियाँ माता के द्वारपाल के रूप में स्थापित हैं। ऐसी मान्यता है कि माता रानी तक भक्तों की प्रार्थना पहुँचाने और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करने में भैरव बाबा की विशेष भूमिका होती है। इसलिए, भक्त नवरात्रि के दौरान सिर्फ माता के नौ रूपों की नहीं बल्कि भैरव बाबा की भी पूजा करते हैं। भैरव बाबा को प्रसन्न करने के लिए उन्हें प्रिय भोग चढ़ाया जाता है और कन्या पूजन में उन्हें विशेष रूप से शामिल किया जाता है। लंगूर को माता का अंगरक्षक मानकर उसकी सेवा करना, भोग लगाना और चरण वंदन करना नवरात्रि पूजन की संपूर्णता को दर्शाता है।

नवरात्रि में जिस प्रकार कन्याओं को हलवा, पूड़ी और चने का प्रसाद खिलाया जाता है, ठीक उसी प्रकार लंगूर के लिए भी अलग थाली सजाई जाती है। उसे भी वही प्रसाद परोसा जाता है जो अन्य कन्याओं को दिया जाता है। इसके बाद उसे दक्षिणा देकर आशीर्वाद लिया जाता है और घर से विदा किया जाता है।

चैत्र नवरात्रि 2025 की तिथियाँ

पंचांग के अनुसार, चैत्र नवरात्रि 2025 की शुरुआत 30 मार्च से होगी और 6 अप्रैल को समाप्त होगी। प्रतिपदा तिथि 29 मार्च को शाम 4:27 बजे शुरू होगी और 30 मार्च को दोपहर 12:49 बजे समाप्त होगी। इसलिए, उदयातिथि के अनुसार चैत्र नवरात्रि 30 मार्च से आरंभ मानी जाएगी।

धार्मिक विशेषज्ञों का मानना है कि नवरात्रि का पूजन तभी पूर्ण माना जाता है जब माता के साथ उनके सेवकों की भी पूजा की जाए। यही कारण है कि भैरव बाबा (लंगूर) को कन्याओं के साथ बिठाकर पूजा जाता है। इससे माता प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं
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