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भद्रकाली माता और कोहिनूर का रहस्य, 1400 साल पुराने मंदिर की अनसुनी कहानी

खास बात यह भी है कि स्थानीय मान्यता रही है कि जिनसे भी कोहिनूर को पाने का लालच किया, वो हमेशा बर्बाद हुआ, चाहे वो मुगल आक्रमणकारी हों या फिर फारसी या अंग्रेज शासक.जिनसे भी कोहिनूर को पाया, वो बर्बाद ही हुआ. माना जाता है कि कोहिनूर सिर्फ मां भद्रकाली के पास ही संरक्षित था.

भद्रकाली माता और कोहिनूर का रहस्य, 1400 साल पुराने मंदिर की अनसुनी कहानी
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19 मार्च से मां भगवती के नौ दिवसीय त्योहार नवरात्रि की शुरुआत हो रही है, जो 27 मार्च तक चलने वाले हैं. नवरात्रि में मां भगवती के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जो देश के हर हिस्से में विद्यमान हैं, लेकिन क्या आप मां के ऐसे उग्र रूप के बारे में जानते हैं कि जिनका संबंध कोहिनूर से था.

आज हम आपको वारंगल की भद्रकाली मां के चमत्कारों के बारे में बताएंगे, जिस पर कई बार आक्रमण हुआ लेकिन मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है.

1400 साल पुराना है मंदिर

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तेलंगाना के वारंगल में स्थित भद्रकाली मंदिर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है जो देवी भद्रकाली को समर्पित है. वारंगल और हनमकोंडा शहरों के बीच एक पहाड़ी की चोटी पर, भद्रकाली झील के किनारे स्थित इस मंदिर का निर्माण 625 ईस्वी में चालुक्य साम्राज्य ने कराया था. हालांकि इतिहास में मंदिर के निर्माण का श्रेय काकतीय वंश से भी जोड़कर देखा जाता है, जहां के राजा ने मां भद्रकाली को कोहिनूर भेंट किया था.

मां की आंख में जड़ा था कोहिनूर

मंदिर के गर्भगृह में मां की धातु और रत्नों से जड़ी प्रतिमा स्थापित है, जिनकी आठ भुजाएं हैं और आठों भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र स्थापित हैं. मां भद्रकाली का यह स्वरूप ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है. मूल रूप से यह मंदिर नागर शैली में निर्मित है, जिसमें एक वर्गाकार गर्भगृह, एक पिरामिडनुमा शिखर और एक स्तंभों वाला हॉल है. दिल्ली सल्तनत के मंदिर पर आक्रमण करने से पहले मंदिर में पत्थर की विशाल मां भद्रकाली की प्रतिमा स्थापित थी. काकतीय राजा प्रतापरुद्र द्वितीय ने खदान से निकलने कोहिनूर हीरे को सुरक्षित रखने के लिए मां भद्रकाली की आंख में लगवा दिया था, लेकिन दो शताब्दियों के बाद मंदिर पर आक्रमणकारियों ने हमला किया और मंदिर को खंडित करके कोहिनूर को अपने साथ ले गए.

आक्रमण के बाद लूट लिया गया कोहिनूर

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मंदिर आक्रमणकारियों के राज में कई सालों तक वीरान पड़ा रहा लेकिन 1950 से पहले लोगों ने आपसी सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया और धातु से बनी और रत्न जड़ी प्रतिमा की स्थापना की. 1950 के बाद ही मंदिर में भक्त दोबारा दर्शन के लिए जा रहे हैं और आज मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है.

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खास बात यह भी है कि स्थानीय मान्यता रही है कि जिनसे भी कोहिनूर को पाने का लालच किया, वो हमेशा बर्बाद हुआ, चाहे वो मुगल आक्रमणकारी हों या फिर फारसी या अंग्रेज शासक.जिनसे भी कोहिनूर को पाया, वो बर्बाद ही हुआ. माना जाता है कि कोहिनूर सिर्फ मां भद्रकाली के पास ही संरक्षित था.

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