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बाथू की लड़ी: 8 महीने पानी में डूबकर भी अडिग रहने वाला रहस्यमयी शिव मंदिर

8 महीने पानी में डूबे रहने की वजह से मंदिर में पूजा-पाठ काफी समय से बंद है. यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से मशहूर है, न कि आध्यात्मिकता की नजरिए से. मंदिर की कुछ प्रतिमाएं प्राचीन होने की वजह से खंडित हो चुकी हैं.

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देशभर में भगवान शिव के कई चमत्कारी मंदिर हैं, जो अपने इतिहास और पौराणिक कथाओं की वजह से विश्व प्रसिद्ध हैं. 

चमत्कारों की बात सभी करते हैं लेकिन उसे आंखों से देख पाना असंभव है. हिमाचल प्रदेश में ऐसा मंदिर है, जहां चमत्कार को अपनी आंखों से देखा जा सकता है. यहां मौजूद मंदिर 8 महीने तक पानी में डूबे रहते हैं लेकिन पत्थर और मंदिर की मजबूती में कोई कमी नहीं है. विज्ञान भी यह समझ नहीं पाया है कि पानी का असर मंदिर पर देखने को क्यों नहीं मिलता.

पानी में डूबा, फिर भी अडिग

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हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा में बाथू मंदिर, जिन्हें 'बाथू की लड़ी' के नाम से भी जाना जाता है. यहां बाथू का मतलब लकड़ी होता है, हालांकि मंदिर विशाल काले पत्थरों से बना है. मंदिर पोंग बांध के जल में प्रतिवर्ष विसर्जन के लिए प्रसिद्ध हैं. यहां के कई मंदिर 6 महीने तक आंशिक रूप से जलमग्न रहते हैं और मानसून के दौरान पूरी तरह से अदृश्य हो जाते हैं. हालांकि गर्मियों के दौरान मंदिर धीरे-धीरे दिखने लगते हैं. मानसून के समय मंदिर तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है और बाकी समय सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं.

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मंदिर की उत्पत्ति को लेकर कई तरह के मत हैं. स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि महाभारत काल के पांडवों ने इन्हें 5000 वर्ष पूर्व बनवाया था. वनवास के दौरान पांडवों ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या कर मंदिर का निर्माण किया था. दूसरी ओर, शोधकर्ता और इतिहासकार इस भव्य रचना का श्रेय हरिपुर-गुलेर के राजा हरिचंद गुलेरिया को देते हैं.

नाम में ‘लकड़ी’, लेकिन निर्माण पत्थरों से

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बाथू मंदिर का आर्किटेक्चर किसी को भी हैरान कर सकता है. मंदिर को काले बलुआ पत्थर से बनाया गया है, जो बहुत भारी और नक्काशी करने में कठिनाई पैदा करते हैं. बलुआ पत्थर की मजबूती की वजह से ही मंदिर प्रकृति की मार झेलने के बाद भी सदियों से खड़ा है. बाथू मंदिर छह अलग-अलग मंदिरों की शृंखला है, जिसमें पांच मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित हैं. हालांकि, गर्भगृह में भगवान शिव विराजमान हैं. शेषनाग, हनुमान, गणेश और देवी काली की आकर्षक मूर्तियां भी इन मंदिरों में शोभा बढ़ाती हैं. बाहरी द्वार पर काली और गणेश की कलात्मक पत्थर की नक्काशी लगभग अद्वितीय है.

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8 महीने पानी में डूबे रहने की वजह से मंदिर में पूजा-पाठ काफी समय से बंद है. यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से मशहूर है, न कि आध्यात्मिकता की नजरिए से. मंदिर की कुछ प्रतिमाएं प्राचीन होने की वजह से खंडित हो चुकी हैं.

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