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बिहार की 'गुप्त काशी' बटेश्वर धाम, जौ भर कमी ने छीना महादेव का निवास!
महादेव की नगरी काशी के बारे में तो आप सब ही जानते होंगे लेकिन क्या आप महादेव की पहली पसंद बिहार के भागलपुर जिले में बसे कहलगाँव के बारे में जानते हैं जिसे देवशिल्पी विश्वकर्मा और वास्तु पुरुष ने महादेव के निवास के लिए चुना गया था. लेकिन आखिर क्या कारण था कि ये पवित्र जगह महादेव की काशी नहीं बन पाई? आइए विस्तार से जानते हैं…
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बाबा विश्वनाथ की नगरी कहलाने वाला वाराणसी शहर दुनिया भर में प्रसिद्ध है. देश-विदेश से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि महादेव की पहली पसंद काशी नहीं थी? पहले बिहार में ही एक जगह को महादेव के निवास के लिए चुना गया था. यह जगह है बिहार का भागलपुर जिला, जिसे सिल्क सिटी यानी रेशम नगरी के नाम से जाना जाता है. भागलपुर के अंतर्गत छोटा सा शहर है कहलगांव. यहां मां गंगा की तेज धारा के बीच एक पहाड़ी पर बाबा बटेश्वर नाथ का मंदिर है, जिसे बटेश्वर धाम भी कहा जाता है.
क्या वास्तु पुरुष ने यहीं स्थान महादेव के लिए चुना था?
कहा जाता है कि काशी बसने से पहले देवर्षि नारद, देवशिल्पी विश्वकर्मा और वास्तुकार वास्तु पुरुष ने यही स्थान महादेव के निवास के लिए चुना था. लेकिन जब इस जमीन की नापी की गई, तो पता चला कि यह जगह कैलाश की भूमि से एक जौ कम है. बस थोड़ी सी जमीन की कमी की वजह से यह जगह काशी नहीं बन पाई. अगर उस समय जौ भर जमीन और मिल जाती, तो यह स्थान कैलाश के बराबर त्रिखंड बन जाता और महादेव आज भी यहीं विराजमान होते.
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महादेव की तीसरी शर्त की वजह से ये जगह काशी नहीं बन पाई!
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यह जगह महादेव की शर्तों के अनुरूप थी. सबसे पहले, यहां गंगा उत्तरवाहिनी बहती है. दूसरी, यह ऋषि कोहल की तपोस्थली थी, जहां उन्होंने कठिन तपस्या की थी, इसलिए यह जगह पवित्र और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थी. लेकिन, तीसरी शर्त कि भूमि कैलाश के बराबर होनी चाहिए, वह पूरी नहीं हुई. यही वजह थी कि महादेव का निवास स्थान बिहार में नहीं बन सका.
ऋषि वशिष्ठ ने यहां की थी महादेव की घोर तपस्या!
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बटेश्वर धाम का महत्व यहीं खत्म नहीं होता. कहा जाता है कि यहीं ऋषि वशिष्ठ ने भी घोर तप किया था. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें रघुकुल का कुल गुरु बनने का वरदान दिया. इसी कुल में भगवान राम का जन्म हुआ और यहीं ऋषि वशिष्ठ ने महादेव की पूजा और साधना की थी.
बटेश्वर शिवलिंग के सामने माता पार्वती का नहीं बल्कि काली का है दिव्य मंदिर!
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इस धाम की खास बात यह है कि बाबा बटेश्वर के शिवलिंग के सामने माता पार्वती का मंदिर नहीं बल्कि मां काली का मंदिर है, जो दक्षिण की ओर विराजमान हैं. इसलिए उन्हें दक्षिणेश्वरी काली कहा जाता है. यही कारण है कि यह जगह एक शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध है. इसे तंत्र विद्या के लिए भी उपयुक्त माना गया है. इसे गुप्त काशी भी कहा जाता है. इतना ही नहीं, यहां गंगा और कोसी का संगम भी है. यह स्थान ऋषि दुर्वासा की तपोस्थली भी रहा है.
Disclaimer: इस जानकारी की पुष्टि NMF NEWS नहीं करता है. ये जानकारी अलग-अलग माध्यमों से लेकर आप तक पहुंचाई गई है.