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550 साल पुराने बांके बिहारी मंदिर को मिला FCRA लाइसेंस, जानें क्या है ये, और इसके कितने फायदे?

वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर को हाल ही में भारत सरकार से FCRA (फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) लाइसेंस प्राप्त हुआ है। इस लाइसेंस के तहत अब मंदिर विदेशी श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान का उपयोग कर सकेगा। 550 साल पुराने इस मंदिर का प्रबंधन पहले पुजारियों के परिवार के हाथ में था, लेकिन हाल के विवादों के बाद अदालत ने एक नई प्रबंधन समिति का गठन किया।

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भारत के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों में से एक, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस प्राचीन मंदिर को भारत सरकार से एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस प्रदान किया गया है। यह कदम मंदिर के प्रबंधन और विदेशी मुद्रा दान के उपयोग के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। हालांकि, इस फैसले ने मंदिर के पुजारियों और प्रबंधन समिति के बीच एक नए विवाद को जन्म दिया है।

क्या है एफसीआरए लाइसेंस?

एफसीआरए, या “फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट”, भारत सरकार द्वारा 1976 में लागू किया गया एक कानून है। इसका उद्देश्य भारत में विदेशी दान और फंडिंग पर निगरानी रखना है, ताकि इसका उपयोग पारदर्शी और सही उद्देश्यों के लिए किया जा सके। यह कानून 1984 में संशोधित किया गया और 2010 में इसे और अधिक सख्त बना दिया गया। एफसीआरए लाइसेंस किसी भी गैर-सरकारी संगठन, धार्मिक संस्था या शैक्षिक संस्था को यह अनुमति देता है कि वह विदेशी स्रोतों से मिलने वाले दान का उपयोग अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों के लिए कर सके।

बांके बिहारी मंदिर को FRCA लाइसेंस कैसे मिला?

550 साल पुराने बांके बिहारी मंदिर का प्रबंधन पहले तक सेवायत गोस्वामी पुजारियों के परिवार द्वारा किया जाता था। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में मंदिर के प्रबंधन और वित्तीय मामलों को लेकर विवाद गहराता गया। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मंदिर के मामलों में हस्तक्षेप की कोशिश के बाद यह मामला अदालत तक पहुंचा। कोर्ट ने मंदिर का नियंत्रण अपने हाथ में लिया और एक नई प्रबंधन समिति का गठन किया। इस समिति ने पाया कि मंदिर को विदेशी श्रद्धालुओं से बड़े पैमाने पर दान मिलता है, लेकिन बिना एफसीआरए लाइसेंस के इन फंड्स का उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए, समिति ने भारत सरकार के गृह मंत्रालय में एफसीआरए लाइसेंस के लिए आवेदन दिया, जिसे हाल ही में स्वीकृत किया गया।

एफसीआरए लाइसेंस मिलने के बाद, अब बांके बिहारी मंदिर विदेशी मुद्रा में मिले दान को वैध तरीके से उपयोग कर सकेगा। इसका सीधा प्रभाव मंदिर के बुनियादी ढांचे, सेवाओं और सामाजिक कार्यों पर पड़ेगा। विदेशी श्रद्धालुओं द्वारा दी गई राशि का उपयोग मंदिर की मरम्मत, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अन्य सामाजिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा।

पुजारियों और प्रबंधन समिति के बीच विवाद

हालांकि एफसीआरए लाइसेंस मंदिर के विकास के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, लेकिन इसके साथ ही विवाद भी खड़ा हो गया है। बांके बिहारी मंदिर के पुजारियों ने दावा किया है कि उन्होंने एफसीआरए लाइसेंस के लिए कोई आवेदन नहीं किया था। उनका कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया प्रबंधन समिति की ओर से की गई है, जिसमें उनकी कोई भागीदारी नहीं थी। पुजारियों का मानना है कि मंदिर का पारंपरिक और आध्यात्मिक प्रबंधन उनके अधिकार क्षेत्र में होना चाहिए। वहीं, प्रबंधन समिति का तर्क है कि विदेशी मुद्रा दान का सही उपयोग और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।

एफसीआरए लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया

एफसीआरए लाइसेंस प्राप्त करने के लिए कुछ खास शर्तें होती हैं,जैसे संबंधित संस्था का पंजीकरण आवश्यक है। संस्था के पास धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक या सांस्कृतिक उद्देश्य होने चाहिए। हर साल मिलने वाले दान का सही लेखा-जोखा सरकार को प्रस्तुत करना होता है। भारत में 2022 तक एफसीआरए के तहत 184 संगठनों ने पंजीकरण करवाया, जिनमें धार्मिक संस्थाओं की बड़ी संख्या शामिल है।

हालांकि एफसीआरए लाइसेंस बांके बिहारी मंदिर के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह प्रबंधन और पुजारियों के बीच चल रहे विवाद को हल करने में नाकाफी लगता है। प्रबंधन समिति को विदेशी मुद्रा दान के उपयोग में पारदर्शिता दिखानी होगी, ताकि पुजारियों और श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे।

बांके बिहारी मंदिर को एफसीआरए लाइसेंस मिलने से मंदिर के विकास और सामाजिक कार्यों को नई दिशा मिल सकती है। हालांकि, पुजारियों और प्रबंधन समिति के बीच संतुलन बनाए रखना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। यह कदम न केवल मंदिर के लिए बल्कि भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक ढांचे के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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