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खून, खौफ और कुर्सी…गैंगस्टर से राजनेता बने अरुण गवली की रिहाई से गरमाई राजनीति, बाल ठाकरे का करीबी कैसे बना शिवसेना नेता का हत्यारा?

अरुण गवली की रिहाई ने पूरा माहौल बदल दिया. 17 साल बाद भी समर्थकों ने गवली का वैसै ही स्वागत किया जैसे उनका दबदबा कई साल पहले था. पुलिस टीम उसे नागपुर के बाबासाहेब अंबेडकर एयरपोर्ट पर लेकर आई.

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80 और 90 के दशक की मुंबई, जब अंडरवर्ल्ड अपने चरम पर था. दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन जैसे डॉन अपने साम्राज्य को विस्तार दे रहे थे. राजनीति की शह में अंडरवर्ल्ड फल फूल रहा था. उसी समय एंट्री हुई ऐसे शख़्स की जो दाऊद इब्राहिम को धमकाने की हिम्मत रखता था जो दाऊद के करीबी को पहले ही ठिकाने लगा चुका था. जो गरीबी से निकलकर मुंबई का गैंगस्टर बना और राजनीति की कुर्सी पर भी काबिज हुआ. नाम है अरुण गवली. 17 साल तक सलाखों के पीछे बंद रहने के बाद, आज ये नाम एक बार फिर सुर्खियों में है. चलिेए जानते हैं दगड़ी के डॉन कहलाने वाले अरुण गवली का इतिहास और वर्तमान.

अंडरवर्ल्ड डॉन अरुण गवली 17 साल के बाद नागपुर जेल से बाहर आ गया है. साल 2007 में उसे शिवसेना नेता कमलाकर जामसांडेकर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरुण गवली को जमानत दी. इसके बाद 3 सितंबर को डॉन अरुण गवली नागपुर जेल से छूटकर बाहर आया. जैसे ही अरुण गवली के कदम जेल से बाहर पड़े पूरा माहौल बदल गया. 17 साल बाद भी समर्थकों ने गवली का वैसै ही स्वागत किया जैसे उनका दबदबा कई साल पहले था. पुलिस टीम उसे नागपुर के बाबासाहेब अंबेडकर एयरपोर्ट पर लेकर आई. 

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Photo- जेल सेे निकलने पर फूूल बरसाकर हुआ अरुण गवली का स्वागत

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आर्थिक तंगी में पढ़ाई छोड़ अपराध की दुनिया में रखा कदम

17 जुलाई 1955 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के कोपरगांव में मज़दूर गुलाबराव गवली के घर बेटे का जन्म हुआ. नाम रखा गया अरुण गवली. परिवार की आर्थिक हालत काफ़ी तंग थी. अरुण गवली पढ़ाई के साथ साथ कम उम्र में काम भी करने लगा था. बाद में पढ़ाई छोड़ वह दूध बेचने जैसे छोटे मोटे काम करने लगा. कुछ समय बाद परिवार के साथ गुलाबराय मुंबई आ गए और यहां एक मिल में काम करने लगे. 1980 और 1990 के दशक में अरुण गवली अपराध की दुनिया से जुड़ गया और धीरे धीरे अंडरवर्ल्ड का बड़ा चेहरा बन गया. 

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दाऊद से दोस्ती और दुश्मनी तक की कहानी

साल 1980 में अरुण गवली रामा नाइक की गैंग से जुड़ा. इसी दौरान दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन से उसकी दोस्ती हुई. कुछ समय तक अरुण गवली ने दाऊद का काम भी संभाला. 1988 में रामा नाइक के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने के बाद गवली ने गैंग की कमान संभाली. उन्हें शक था कि रामा की हत्या में दाऊद का हाथ था. इसके बाद 1990 में अरुण गवली के बड़े भाई किशोर उर्फ पप्पा की हत्या भी हो गई. यहां गवली का शक यक़ीन में बदल गया. अब उसने ठान लिया था कि वह दाऊद से भाई की मौत का बदला लेकर रहेगा और यहीं से नींव पड़ी दाऊद और गवली के बीच दुश्मनी की. 

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दाऊद के बहनोई का मर्डर

दाऊद से बदले का पूरा प्लान तैयार था. सब कुछ माइंड में था, समय, जगह और टारगेट. 26 जुलाई 1992 के दिन अरुण गवली के चार शूटर्स ने दाऊद की बहन हसीना पारकर के पति इब्राहिम पारकर को मुंबई के नागपाड़ा इलाक़े में गोलियों से भूनकर मार डाला. 

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Photo- हसीना पारकर और दाऊद इब्राहिम

अपने बहनोई की हत्या से दाऊद बौखला गया. जवाब में उसने भी मुंबई के जेजे हॉस्पिटल में फ़ायरिंग करवाई. यहां अरुण गवली का गुर्गा शैलेश हलदनकर एडमिट था. फायरिंग में शैलेश के साथ-साथ दो पुलिसकर्मी भी मारे गए. दोनों के बीच दुश्मनी की जंग कई खूनी खेल खेलने के बाद भी नहीं थमी. 

क्यों कहा गया दगड़ी चॉल का डैडी? 

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अरुण गवली ने मुंबई के बायकुल्ला इलाके के दगड़ी चॉल को अपना गढ़ बनाया था. दगड़ी चॉल 1970 से ही गवली की आपराधिक गतिविधियों का केंद्र रहा. यहीं पर गवली की गैंग रंगदारी, हफ्ता वसूली, किडनैपिंग और सुपारी जैसे अपराधों को अंजाम देती थी.  गवली को उनके समर्थकों ने 'डैडी' का नाम दिया था और उनकी पत्नी आशा को 'मम्मी' कहा जाता था. आशा भी दगड़ी चाल की 'लेडी डॉन' के रूप में जानी जाती थी. आशा पहले ज़ुबैदा थी गवली से शादी के बाद वह नाम और धर्म बदलकर आशा गवली कहलाईं. दोनों के तीन बच्चे भी हैं. जिनमें दो बेटी और एक बेटा शामिल है. 

राजनीति में एंट्री करते ही बाल ठाकरे का करीबी बना!

1990 के दशक में मुंबई में गैंगवॉर और पुलिस एनकाउंटर बढ़ने लगे थे. इसी बीच 1993 सीरियल ब्लास्ट के बाद मुंबई के बड़े डॉन भी शहर छोड़ चुके थे. इस ब्लास्ट में दो घंटे के भीतर सिलसिलेवार 12 धमाके हुए थे. इनमें 257 लोगों की मौत हुई थी. जबकि 713 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. उस वक़्त मुंबई में अंडरवर्ल्ड की दुनिया में अरुण गवली और अमर नाइक का ही राज था. 1996 में मुंबई पुलिस ने एनकाउंटर में अमर नाइक को भी ढेर कर दिया था. कई शूटर्स भी एनकाउंटर में मारे जा रहे थे. यहां से गवली भी समझ गया था कि मुंबई में लंबे समय तक उन्हें राजनीति ही सुरक्षित रख सकती है.

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साल 1997 में अरुण गवली ने ‘अखिल भारतीय सेना' नाम की पार्टी बनाई. शुरू में वे शिवसेना के करीब थे. शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का तो वह फ़ेवरेट था. बाल ठाकरे ने इसका ज़िक्र कई रैलियों में भी किया था. एक बार बाल ठाकरे ने कहा था, पाकिस्तान के पास दाऊद है तो हमारे पास अरुण गवली है. हालांकि शिवसेना से उनके रिश्ते बिगड़ गए इसकी वजह भी अरुण गवली की बढ़ती राजनीतिक ताक़त ही थी. कहा जाता है कि एक बार अरुण गवली की रैली में बाल ठाकरे की रैली से भी ज़्यादा समर्थक जुटे थे. 

हारकर जीतने वाला बाज़ीगर!

साल 2004 में अरुण गवली ने दक्षिण मध्य मुंबई लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गया. हार के बाद भी गवली को पता चल गया था कि इलाक़े में उसकी पकड़ तगड़ी है क्योंकि उसे भारी जन समर्थन मिला था. कहा जाता है गवली की हार की वजह उसके भतीजे सचिन अहीर का पाला बदलना था. सचिन अहीर NCP में शामिल हो गए थे. इसके बाद 2004 में ही गवली ने चिंचपोकली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और विधायक बने. 

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कमलाकर जामसांडेकर हत्या और जेल

साल 2007 में शिवसेना कॉर्पोरेटर कमलाकर जामसांडेकर की हत्या ने गवली के राजनीतिक पतन की शुरुआत की. शिवसेना नेता कमलाकर जामसांडेकर की एक शख़्स ने उनके आवास पर गोली मारकर हत्या कर दी. जांच में सामने आया कि कमलाकर जामसांडेकर की हत्या अरुण गवली के ऑर्डर पर ही की गई थी. गवली ने इसके लिए 30 लाख रुपये की सुपारी दी थी. दोनों के बीच ज़मीन के सौदे को लेकर रंजिश चल रही थी. गवली को गिरफ्तार कर लिया गया. साल 2012 में मुंबई की MCOCA अदालत ने गवली और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई। उन पर 17 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा और गवली को नागपुर सेंट्रल जेल में रखा गया. 

गवली को किस आधार पर मिली जमानत? 

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70 साल की उम्र में अरुण गवली ने स्वास्थ्य कारणों और महाराष्ट्र सरकार के 2006 के सर्कुलर (14 साल की सजा और 65 साल की उम्र वाले कैदियों की रिहाई) का हवाला देकर रिहाई की मांग की. अप्रैल 2024 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसकी रिहाई का आदेश दिया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी अगस्त 2025 में गवली को ज़मानत दे दी. 3 सितंबर 2025 को 17 साल बाद गवली नागपुर जेल से रिहा होकर मुंबई लौटा. उसकी रिहाई के बाद मुंबई और नागपुर में सुरक्षा बढ़ा दी गई. 

Photo- सोशल मीडिया

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अरुण गवली की ज़िंदगी पर बनी फ़िल्में 

अरुण गवली की जिंदगी पर बॉलीवुड फ़िल्में भी बनीं. इनमें साल 2015 में आई मराठी फिल्म 'दगड़ी चॉल' और 2017 में बॉलीवुड फिल्म 'डैडी' शामिल है. डैडी में अर्जुन रामपाल ने गवली का किरदार निभाया था. इस किरदार के लिए अर्जुन रामपाल ने जेल में अरुण गवली से मुलाक़ात भी की थी. जिस पर उस वक़्त काफ़ी बवाल हुआ था. पुलिस ने अर्जुन रामपाल को नोटिस भी भेजा था. 

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दूध बेचने से शुरू हुआ अरुण गवली का सफर मुंबई के अंडरवर्ल्ड में 'डैडी' बनने और फिर विधायक बनने तक पहुंचा, लेकिन अपराध ने उन्हें हवालात पहुंचा दिया. हालांकि अरुण गवली की रिहाई के बाद एक सवाल फिर उठने लगा. क्या अरुण गवली अब साधारण ज़िंदगी की ओर रुख़ करेगा या अपनी अधूरी राजनीतिक चाहत को पूरा करने के लिए फिर सियासत में क़िस्मत आज़माएगा? 

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