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चार मंजिला मकान, अजीब दरवाजे... दिल्ली की ‘ड्रग्स क्वीन’ कुसुम ने खिड़की से कैसे खड़ा किया नशे का साम्राज्य, बनाई करोड़ों की दौलत

चार मंजिला मकान, बंद खिड़कियां और अंदर चल रहा करोड़ों का नशे का कारोबार… दिल्ली की एक आम दिखने वाली महिला कैसे ‘ड्रग्स क्वीन’ बन गई, ये जानकर आप हैरान रह जाएंगे. कुसुम ने घर की खिड़की को बना दिया था तस्करी का रास्ता, महिलाओं की पूरी फौज तैयार की और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर खड़ा किया एक काला साम्राज्य. जानिए कैसे एक खिड़की से शुरू हुई यह कहानी बना भारत के सबसे शातिर ड्रग नेटवर्क का हिस्सा.

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पहली नजर में वह घर आपको चौंकाएगा. चार मंजिला मकान. जेल जैसी खिड़कियां. आखिर यह क्या डिजाइन है भाई! दिल्ली के सुल्तानपुरी में एक कमरे के घरों के बीच में यह मिनी हवेली जैसी थी. बाहर से देखने पर आप जिन्‍हें, 4 अलग-अलग घर समझेंगे, वो अंदर से एक मकान है. चार मकानों के भीतरी दीवारों को तोड़कर इस चार मंजिले मकान को एक बनाया गया था. दरअसल दिल्ली की 'ड्रग्स क्वीन' कुसुम (Drugs Queen Kusum) ने इसे बहुत सोच समझकर डिजाइन कराया था. खिड़कियों का राज क्या है, कैसे करोड़ों का धंधा संचालित होता था, मुखबिर तैनात रहते थे... पूरा राज जानने पर आप भी हैरान रह जाएंगे. 

'डिजाइनर मकान’ नहीं, बल्कि ‘ड्रग्स अड्डा’

इस मकान की सबसे बड़ी खासियत थी—उसकी बनावट. मकान में चार बाहरी गेट थे, लेकिन अंदर से ये एक ही नेटवर्क से जुड़े हुए थे. छतों को ऐसे जोड़ा गया था कि पुलिस छापा पड़ते ही वह एक छत से दूसरी छत पर भाग सके. खिड़कियां बाहर से इतनी छोटी थीं कि झांकना भी मुश्किल था—but यही खिड़की बन गई ‘ड्रग्स की खिड़की’, जहां से डीलिंग होती थी. 

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खिड़की से बिकती थी मौत… और किसी को खबर नहीं होती थी

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कुसुम ने एक खिड़की को ‘सेफ ज़ोन’ बना दिया था. ग्राहक आते, पैसे खिड़की से अंदर देते और पैकेट ले जाते. आसपास के लोगों को सिर्फ इतना पता था कि कुसुम के घर पर भीड़-भाड़ रहती है, लेकिन उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि वहां से कोकीन, स्मैक और हेरोइन जैसे जानलेवा नशे का व्यापार चल रहा है.

'ड्रग डीलिंग गैंग’ की बॉस बनी महिला

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कुसुम ने खुद को कभी सामने नहीं रखा. उसने कई महिलाओं को अपने गैंग में शामिल किया, जिन्हें वह “कामवाली बहनें” कहती थी. ये महिलाएं घर-घर जाकर छोटी मात्रा में नशा पहुंचाती थीं. कुछ को वह ‘डिलीवरी गर्ल’ की तरह ट्रेन कर चुकी थी, जो बसों और ट्रेनों से माल इधर-उधर करती थीं. सबसे खास बात—इनमें ज्यादातर महिलाएं गरीब पृष्ठभूमि से थीं और कुसुम उन्हें हर हफ्ते पेमेंट करती थी. 

फोन पर कोडवर्ड्स, CCTV पर नजर

कुसुम ने पूरी तकनीकी व्यवस्था अपनाई थी. ग्राहक से बात करने के लिए कोडवर्ड्स का इस्तेमाल होता था—जैसे “लिफाफा चाहिए”, “पुराना माल है?” या “5 नंबर चाय चाहिए”. घर के अंदर और बाहर 360 डिग्री कैमरे लगे थे. अगर कोई अनजान चेहरा आता, तो डील रोक दी जाती थी. खिड़की से माल तभी दिया जाता, जब व्यक्ति पहचाना हुआ हो. 

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फर्जी दस्तावेज, कई नाम—असलियत छुपी रही सालों तक

कुसुम के पास कई आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी थे. हर जगह वह अलग नाम से फ्लैट किराए पर लेती और वहीं से माल सप्लाई कराती. इसीलिए वह कई सालों तक पुलिस की पकड़ से दूर रही. उसके पास से बरामद दस्तावेजों में से कई की असली पहचान आज तक पुलिस को नहीं मिली है. 

क्राइम की मास्टरमाइंड, पर समाजसेविका की छवि

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कुसुम के बारे में पड़ोसी बताते हैं कि वह दिखने में साधारण और बातचीत में नरम थी. किसी को भी शक नहीं था कि वह इतनी बड़ी ड्रग माफिया हो सकती है. वह मोहल्ले की महिलाओं की मदद करती, उनके बच्चों की फीस भरती और बीमार पड़ोसियों को दवा देती थी. इसी वजह से उसकी असली पहचान सालों तक छुपी रही. 

आखिरकार गिरफ़्तारी, लेकिन कहानी अभी बाकी है

कुसुम को जब पुलिस ने पकड़ा, वह एक महिला के वेश में भागने की कोशिश कर रही थी. उसके पास से न केवल ड्रग्स, बल्कि नए ID कार्ड, नकद रुपये और मोबाइल डेटा मिला है, जिससे उसके बड़े नेटवर्क की परतें खुल रही हैं. दिल्ली पुलिस और NCB अब उसके संपर्क में आए सभी लोगों को चिन्हित करने में जुटी है. 

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वेध (रेड) और जब्ती: क्या मिला छापे में?

• पुलिस ने मार्च 2025 की छापेमारी में हेरोइन के 550 पैकेट, ट्रामाडोल, ₹14‑15 लाख नकद और एक महिंद्रा स्कॉर्पियो जब्त की थी, साथ ही कुसुम के बेटे अमित को गिरफ्तार किया. 
• बैंक खातों की जांच में उसकी बेटियों के खातों में 18 महीनों में ₹2 करोड़ जमा पाए गए, जिनमें कई छोटे-छोटे ₹2‑5 हजार के ट्रांजैक्शन थे जो संदिग्ध माने गए. 
• कुल मिलाकर आठ अचल संपत्तियाँ जब्त की गईं — सात सुल्तानपुरी में और एक रोहिणी सेक्टर 24 में. 

'ड्रग्स क्वीन’ की गिरफ्तारी से हिला पूरा नेटवर्क

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कुसुम की गिरफ्तारी के बाद राजधानी में फैले कई रैकेटों में हलचल मच गई है. माना जा रहा है कि वह केवल एक मोहरा थी, और उससे ऊपर भी कोई बड़ा खिलाड़ी हो सकता है. पुलिस की अब जांच इस दिशा में बढ़ रही है कि कुसुम को नशा कहां से मिलता था और वह किसके लिए काम करती थी. 

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एक खिड़की से शुरू हुआ था सब… और बना एक ‘ड्रग्स का किला’
कुसुम की कहानी डराती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है कि कैसे एक आम दिखने वाली महिला ने इतनी गहराई से अपराध की दुनिया में कदम रखा और एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया, जो आज भी पूरी तरह उजागर नहीं हो पाया है. 

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