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JNU की बड़ी घोषणा, इन छात्रों की फीस में भारी कटौती, सबसे ज्यादा इन स्टूडेंट्स को मिलेगा फायदा

जेएनयू का यह निर्णय न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से सराहनीय है, बल्कि यह शिक्षा के क्षेत्र में भारत की वैश्विक भूमिका को भी मजबूत करता है. यह नीति उन छात्रों को अवसर प्रदान करेगी जो पहले उच्च फीस के कारण भारत में पढ़ाई करने की सोच भी नहीं सकते थे. साथ ही, यह विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुनः प्रतिष्ठा बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो सकती है.

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JNU Fees: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), जो भारत के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में से एक है, ने विदेशी छात्रों के लिए एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी फैसला लेते हुए उनकी ट्यूशन फीस में भारी कटौती की है. यह कदम खास तौर पर उन देशों के छात्रों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं या विकासशील माने जाते हैं. इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर उच्च शिक्षा को अधिक सुलभ बनाना और जेएनयू को अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बनाना है.

फीस कटौती के पीछे का कारण

जेएनयू प्रशासन के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में विदेशी छात्रों के नामांकन में लगातार गिरावट देखी गई है. जहाँ 2020-21 में विश्वविद्यालय में 152 विदेशी छात्र नामांकित थे, वहीं 2023-24 तक यह संख्या घटकर मात्र 51 रह गई. यह गिरावट वैश्विक स्तर पर महामारी, आर्थिक संकट और उच्च फीस जैसे कारकों की वजह से आई है. इसी गिरावट को थामने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने फीस ढांचे में बड़ा बदलाव किया है, जिससे अधिक से अधिक अंतरराष्ट्रीय छात्र आकर्षित हो सकें.

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सार्क देशों के छात्रों के लिए बड़ी राहत

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जेएनयू द्वारा सार्क देशों (जैसे नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि) के छात्रों के लिए फीस में उल्लेखनीय कटौती की गई है. मानविकी (Humanities) पाठ्यक्रमों में जहां पहले सेमेस्टर फीस 700 डॉलर थी, अब उसे घटाकर 200 डॉलर कर दिया गया है, जो कि करीब 71% की कमी को दर्शाता है. विज्ञान (Science) पाठ्यक्रमों की फीस 700 डॉलर से घटाकर 300 डॉलर की गई है, जो लगभग 57% की कटौती है. यह बदलाव इन पड़ोसी देशों के छात्रों को शिक्षा के लिए भारत की ओर आकर्षित करने में सहायक हो सकता है.

अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी छात्रों के लिए विशेष छूट

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अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के छात्रों को जेएनयू के इस नए शुल्क ढांचे से सबसे अधिक लाभ मिलेगा. इन देशों को आर्थिक रूप से कमजोर माना जाता है और वहां के छात्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्राप्त करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है. इसी को ध्यान में रखते हुए मानविकी पाठ्यक्रमों की फीस को 1,500 डॉलर से घटाकर मात्र 300 डॉलर कर दिया गया है, यानी करीब 80% की कटौती. विज्ञान पाठ्यक्रमों की फीस को 1,900 डॉलर से घटाकर 400 डॉलर किया गया है, जो लगभग 78% की कटौती है। यह कदम जेएनयू की समावेशी और वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाता है.

पश्चिम एशिया के छात्रों के लिए भी राहत

पश्चिम एशियाई देशों के छात्रों को भी अब पहले की तुलना में कम फीस देनी होगी। विज्ञान पाठ्यक्रमों के लिए अब उन्हें 1,900 डॉलर की बजाय 600 डॉलर देने होंगे, यानी लगभग 68% की कमी. वहीं मानविकी पाठ्यक्रमों की फीस को 1,500 डॉलर से घटाकर 500 डॉलर कर दिया गया है, जो लगभग 66% की गिरावट है. यह फैसला पश्चिम एशिया से आने वाले छात्रों के लिए भारत को एक बेहतर और किफायती शैक्षणिक गंतव्य बना सकता है.

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अन्य देशों के लिए भी बदलाव

केवल आर्थिक रूप से कमजोर देशों ही नहीं, बल्कि अन्य सभी देशों के लिए भी फीस में कटौती की गई है। अब विज्ञान पाठ्यक्रमों की फीस को $1,900 से घटाकर $1,250 कर दिया गया है, जो लगभग 34% की कमी है. मानविकी पाठ्यक्रमों के लिए यह फीस $1,500 से घटकर $1,000 हो गई है, जो 33% की गिरावट दर्शाती है। इसके साथ ही, सभी विदेशी छात्रों को अब $500 का एकमुश्त पंजीकरण शुल्क भी देना होगा, जो पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी और सुसंगत व्यवस्था को दर्शाता है.

शिक्षा को सुलभ बनाने की दिशा में बड़ा कदम

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जेएनयू का यह निर्णय न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से सराहनीय है, बल्कि यह शिक्षा के क्षेत्र में भारत की वैश्विक भूमिका को भी मजबूत करता है. यह नीति उन छात्रों को अवसर प्रदान करेगी जो पहले उच्च फीस के कारण भारत में पढ़ाई करने की सोच भी नहीं सकते थे. साथ ही, यह विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुनः प्रतिष्ठा बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो सकती है. यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में जेएनयू विदेशी छात्रों के बीच एक प्रमुख शैक्षणिक गंतव्य के रूप में उभरेगा.

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