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DU के सिलेबस में बड़ा बदलाव, हटेगा भारत-विरोधी कंटेंट और जुड़ेगा 'ऑपरेशन सिंदूर'!
दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) ने अपने सिलेबस में बड़ा बदलाव किया है. इस अपडेट में भारत-विरोधी कंटेंट को हटाया जाएगा और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे देशभक्ति से जुड़े नए विषय शामिल किए जाएंगे.
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दिल्ली यूनिवर्सिटी अब अपने सिलेबस में बदलाव करने की तैयारी में है. अब पढ़ाई सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसमें देशभक्ति का तड़का भी लगेगा. अगर कोई कंटेंट देश के खिलाफ या भारत विरोधी विचारों से जुड़ा है तो वो अब क्लासरूम से बाहर का रास्ता देखेगा.
क्या बोले वाइस चांसलर?
DU के वाइस चांसलर प्रो. योगेश सिंह ने साफ कहा है कि सभी विभागों को अपने-अपने कोर्स की रिव्यू करने को कहा गया है. खासतौर पर पाकिस्तान से जुड़े उन लेखकों या शायरों को हटाया जाएगा, जिनकी लिखाई में देशविरोधी बातें या अनावश्यक तारीफ हो.
उन्होंने कहा -
"पाकिस्तान एक हकीकत है, इसलिए इतिहास में उसका जिक्र जरूरी है. लेकिन जो लोग भारत के खिलाफ हैं, उन्हें कोर्स में पढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है"
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इकबाल की जगह आएंगे लौह पुरुष सरदार पटेल
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हाल ही में दिल्ली यूनिवर्सिटी की एकेडमिक स्टैंडिंग कमेटी ने ये सिफारिश की है कि इतिहास विभाग के 8वें सेमेस्टर के कोर्स से प्रसिद्ध शायर मोहम्मद इकबाल का नाम हटाया जाए और उसकी जगह सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को जोड़ा जाए.
ये प्रस्ताव यूनिवर्सिटी की एकेडमिक काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल दोनों में पास हो चुका है. यानी अब छात्र आने वाले समय में भारत के एकीकरण में सरदार पटेल की भूमिका को ज्यादा गहराई से पढ़ पाएंगे.
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"ऑपरेशन सिंदूर" भी आ सकता है सिलेबस में
DU प्रशासन सिलेबस में एक और नया अध्याय जोड़ने की योजना बना रहा है – "ऑपरेशन सिंदूर", जो भारत की सैन्य रणनीतियों और साहसिक अभियानों से जुड़ा है. हालांकि इस प्रस्ताव पर अभी चर्चा जारी है, लेकिन उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इसे औपचारिक रूप से कोर्स का हिस्सा बनाया जाएगा.
प्रोफेसर्स में बंटे मत
इस फैसले को लेकर DU के भीतर ही मतभेद उभरने लगे हैं. किरोड़ीमल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर रुद्राशीष चक्रवर्ती ने कहा, "यूनिवर्सिटी का काम छात्रों को निष्पक्ष और आलोचनात्मक सोच सिखाना है. अगर हम केवल एक नजरिए से पढ़ाएंगे, तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी.”
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वहीं राजधानी कॉलेज के प्रोफेसर राजेश झा ने भी चिंता जाहिर की. उनका मानना है कि, "सिलेबस बनाना विषय विशेषज्ञों का काम है, और उन्हें पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए ताकि वो विषय को उसके गहरे संदर्भों में पढ़ा सकें.”
बता दें दिल्ली यूनिवर्सिटी की ये पहल शिक्षा व्यवस्था में "देशहित बनाम अकादमिक स्वतंत्रता" की बहस को एक बार फिर से जिंदा कर रही है. एक तरफ ये बदलाव देशभक्ति की सोच को आगे बढ़ाने के लिए किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ कुछ लोग चिंता जता रहे हैं कि इससे पढ़ाई की आजादी और छात्रों की अपनी सोच पर असर पड़ सकता है.
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आने वाले समय में देखना दिलचस्प होगा कि ये बदलाव छात्रों की सोच और शिक्षा प्रणाली पर क्या प्रभाव डालते हैं.