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खुन्नस और बड़बोलापन... ट्रंप ने कैसे अमेरिका के खिलाफ ही खड़ा किया 'न्यू वर्ल्ड ऑर्डर', भारत जैसे दोस्तों को भी बना डाला दुश्मन!

ट्रंप ने “अमेरिका फर्स्ट” और MAGA के नारे पर सत्ता में वापसी तो की, लेकिन उनकी जिद, बड़बोलापन और व्यक्तिगत खुन्नस ने अमेरिका के लिए उलटा असर डाला. टैरिफ पॉलिसी से भारत जैसे दोस्त दूर हुए, रिश्तों में दरार आई और चीन-रूस के साथ नई धुरी खड़ी हो गई. नतीजा ये निकला कि दुनिया अब न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की ओर बढ़ रही है, जहां अमेरिका अकेला नेता नहीं बल्कि कई शक्तियों में से एक रह जाएगा.

Image: PM Modi / Donald Trump (File Photo)
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डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं. उन्हें बिजनेस, चर्च, लॉबी, लेफ्ट, लिबरल और मीडिया नेक्सस के गठजोड़ को तोड़ने वाला और ट्रेडिशनल पॉलिटिक्स से इतर काम करने वाले नेता के तौर पर जाना गया. उन्होंने इस कारण न सिर्फ सैटेलाइट टीवी, पेपर, मैग्जीन्स पर हमला बोला बल्कि एक पूरा MAGA कैंपेन खड़ा कर दिया.  ट्रंप ने अमेरिकी राजनीति में अपनी पहचान अमेरिका फर्स्ट की नीति के साथ बनाई. यह नारा केवल चुनावी जुमला नहीं था बल्कि उनकी पूरी विदेश और आर्थिक नीति की धुरी भी बन गया. राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इसे व्यवहारिक रूप दिया और सबसे बड़ा हथियार चुना टैरिफ यानी आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाना. ट्रंप का मानना था कि यह कदम अमेरिकी नौकरियों को वापस लाएगा, घरेलू उद्योग को मजबूत करेगा और वैश्विक व्यापार में अमेरिका का पलड़ा भारी करेगा. यहीं नहीं उन्होंने टैरिफ को अपनी विदेश नीति के टूल के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया. आमतौर पर ऐसा होता है कि व्यापार और विदेश नीति जुड़े होने के साथ-साथ अलग-अलग वर्क करते हैं, लेकिन ट्रंप ने सबका घालमेल कर दिया. इसका आपको ट्रंप के उस फेक और बड़बोले दावे से पता चलता है जब उन्होंने भारत-पाक के सैन्य तनाव में मध्यस्थ बनने को लेकर कहा था कि अगर दोनों देश सीजफायर करते हैं तो दोनों के साथ अच्छी डील करूंगा, हालांकि हिंदुस्तान ने इन दावों को खारिज कर दिया.

वैसे तो शुरुआती दिनों में उनकी नीति को अमेरिका के भीतर समर्थन भी मिला. वर्किंग क्लास और औद्योगिक सेक्टर में लोग इसे देश की सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे थे. लेकिन समय के साथ वास्तविकता सामने आई. टैरिफ का असर उलटा पड़ने लगा. महंगाई बढ़ने लगी, अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ी और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर सीधा असर दिखने लगा. इससे भी बड़ी समस्या यह हुई कि जिन देशों को अमेरिका अपना सहयोगी मानता था, वे धीरे-धीरे इस नीति से नाराज होने लगे.

भारत-अमेरिका संबंधों की बात करें तो बराक ओबामा और जॉर्ज बुश जैसे राष्ट्रपतियों ने दोनों देशों के बीच की दूरी घटाने में अहम भूमिका निभाई थी. रणनीतिक साझेदारी से लेकर रक्षा और व्यापारिक समझौतों तक, भारत और अमेरिका करीब आते गए. करीब 25 सालों तक दोनों देशों के डिप्लोमेट और लीडरशिप ने साथ काम करने के लिए कड़ी मेहनत की थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तो यह रिश्ता और प्रगाढ़ हुआ. ट्रंप के शुरुआती दिनों में भी लग रहा था कि मोदी और ट्रंप की व्यक्तिगत दोस्ती भारत को कई तरह की छूट दिला सकती है. हाउडी मोदी से लेकर नमस्ते ट्रंप तक को देखकर तो कोई उम्मीद भी नहीं कर सकता था कि ये दोस्ती एक दिन हिचकोले खाने लगेगा. लेकिन ट्रंप के एकतरफे दावे, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए अपमानजनक बयानों से कुछ ही वर्षों में यह उम्मीद ध्वस्त हो गई.

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व्यापार पर भारत ने संप्रभुता को दी तवज्जो!

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ट्रंप प्रशासन ने भारत पर टैरिफ का बोझ डालना शुरू कर दिया. कई उत्पादों पर पचास प्रतिशत तक शुल्क लगाया गया. यह उस समय किया गया जब रूस-यूक्रेन जंग और वैश्विक अस्थिरता की आड़ में अमेरिका ने व्यापारिक दबाव बढ़ाना शुरू किया. भारत के लिए यह केवल आर्थिक चुनौती नहीं थी बल्कि रणनीतिक झटका भी था. भारत ने तुरंत नए विकल्प तलाशने शुरू किए. रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा, चीन के साथ व्यापारिक सहयोग बढ़ाया और बहुपक्षीय मंचों जैसे शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में सक्रियता दिखाई.

SCO जरिए भारत ने दिया अमेरिका को साफ संदेश!

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हाल ही में एससीओ समिट में नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की मुलाकात ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अमेरिकी दबाव में आने को तैयार नहीं है. यह तस्वीर केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक संकेत थी कि शक्ति संतुलन का समीकरण बदल रहा है.

भारत में कैसे फेल हो गई ट्रंप की रणनीति

ट्रंप की रणनीति भारत पर क्यों असफल रही, इसके कई कारण हैं:

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पहला कारण है भारत का विशाल बाजार. अमेरिका के लिए भारत दवाओं, तकनीक और कृषि उत्पादों का बड़ा उपभोक्ता है. अगर भारत पर दबाव बनाया जाता है तो नुकसान अमेरिकी कंपनियों को भी उठाना पड़ता है. 

दूसरा कारण भारत की विकल्प तलाशने की क्षमता और स्वतंत्र विदेश नीति जो उसे अपने राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने की ताकत देता है. जब अमेरिका ने टैरिफ के जरिए दबाव डाला, भारत ने चीन, रूस और अन्य देशों के साथ साझेदारी बढ़ा ली. भारत ने तियानजिन जाकर ट्रंप को साफ संदेश दे दिया कि उसे टेकन फॉर ग्रांटेड नहीं लिया जा सकता है.

तीसरा कारण रणनीतिक मजबूरी है. एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है और इस चुनौती का संतुलन केवल भारत ही कर सकता है. ऐसे में अमेरिका भारत को पूरी तरह नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता. चौथा कारण भारत की आत्मनिर्भरता की नीति है. मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों ने भारत को आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में खड़ा किया है.

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'ट्रंप की ताकत ही बनी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी'

ट्रंप की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी राजनीति में स्थिरता नहीं है. कभी वह भारत और रूस के चीन की ओर झुकने की बात करते हैं, तो कभी नरेंद्र मोदी को शानदार प्रधानमंत्री बताते हैं और दोस्ती का भरोसा दिलाते हैं. यह ढुलमुल रवैया अमेरिका की रणनीतिक बेचैनी को दर्शाता है. वॉशिंगटन को यह डर सताने लगा है कि अगर भारत रूस और चीन के साथ खड़ा हो गया तो अमेरिकी एशिया रणनीति पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी.

ट्रंप के कारण साथ आए अमेरिका के प्रतिद्वंदी

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दरअसल, ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने केवल भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी नए समीकरण गढ़ दिए. रूस और चीन का गठजोड़ और मजबूत हुआ. पश्चिमी पाबंदियों ने रूस को चीन के और करीब कर दिया. यूरोप ने भी डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाने की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया. यूरोपीय देशों ने नए साझेदार तलाशने और वैकल्पिक व्यवस्था पर जोर दिया. भारत जैसे उभरते देशों ने इस दौर का फायदा उठाकर आत्मनिर्भरता और नए व्यापारिक रिश्तों पर जोर दिया.

न्यू वर्ल्ड ऑर्डर और ग्लोबल साउथ का लीडर बना भारत

इन सबके बीच एक नई हकीकत सामने आने लगी है, वो है न्यू वर्ल्ड ऑर्डर. यानी दुनिया अब केवल एक ध्रुव पर आधारित नहीं रहेगी. शक्ति का केंद्र केवल वॉशिंगटन में नहीं रहेगा बल्कि कई देशों और क्षेत्रों में बंट जाएगा. यह वह स्थिति है जिसकी आहट आज स्पष्ट सुनाई देने लगी है.

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अमेरिका की सबसे बड़ी साख यह थी कि वह अपने सहयोगियों का सबसे भरोसेमंद साथी है. लेकिन ट्रंप की टैरिफ रणनीति ने इस छवि को गहरी चोट पहुंचाई. जब अमेरिका अपने दोस्तों को भी दुश्मन जैसा व्यवहार करने लगे और प्रतिस्पर्धियों को और ज्यादा धकेल दे, तो दुनिया का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है. यही वजह है कि अब देश अमेरिका को अकेला विकल्प मानने से पीछे हटने लगे हैं.

शीत युद्ध के दौर में भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया था और महाशक्तियों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. आज हालात फिर उसी ओर जाते दिख रहे हैं, लेकिन फर्क यह है कि इस बार भारत कहीं ज्यादा ताकतवर और आत्मनिर्भर है.

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डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट रणनीति ने अमेरिकी जनता को भले ही शुरुआत में उत्साहित किया हो, लेकिन दुनिया के स्तर पर इसका उल्टा असर हुआ. सहयोगी देश दूर हुए, प्रतिस्पर्धियों के बीच गठजोड़ मजबूत हुआ और नई धुरी बनने लगी. आने वाले वर्षों में यह और साफ होगा कि ट्रंप की नीतियों ने न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की नींव रख दी है, जिसमें अमेरिका अकेला नहीं बल्कि कई ताकतों में से एक होगा.

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