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नोएडा का 'अपना घर' आश्रम: कॉर्पोरेट सुविधाओं को टक्कर दे रहा बेसहारा लोगों का आशियाना

'अपना घर' आश्रम में प्रवेश करते ही राधे-राधे की गूंज और प्रेम भरा माहौल मन को छू लेता है. यहां रहने वाले हर व्यक्ति को 'प्रभुजी' कहकर संबोधित किया जाता है, जो इस आश्रम की संवेदनशीलता और सम्मान को दर्शाता है. फिलहाल आश्रम में करीब 300 बेसहारा महिलाएं रहती हैं. इनके भोजन, स्वास्थ्य, और हर दैनिक जरूरत की देखभाल के लिए 35 सेवादार 24 घंटे समर्पित भाव से कार्य करते हैं.

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नोएडा में स्थित 'अपना घर' आश्रम एक ऐसी जगह है, जो बेसहारा और अपनों से बिछड़े लोगों के लिए परिवार की तरह है. यह आश्रम न केवल उनके लिए आश्रय प्रदान करता है, बल्कि उनके जीवन में फिर से उम्मीद की किरण जगाता है. यहां की हर कहानी, हर चेहरा, और सेवादारों का हर प्रयास मानवता की मिसाल पेश करता है. आइए, इस आश्रम की व्यवस्था, सेवादारों की निस्वार्थ सेवा और प्रभुजियों की मार्मिक कहानियों को और करीब से जानते हैं.

एक घर, जहां निवास करते है 'प्रभुजी'

'अपना घर' आश्रम में प्रवेश करते ही राधे-राधे की गूंज और प्रेम भरा माहौल मन को छू लेता है. यहां रहने वाले हर व्यक्ति को 'प्रभुजी' कहकर संबोधित किया जाता है, जो इस आश्रम की संवेदनशीलता और सम्मान को दर्शाता है. फिलहाल आश्रम में करीब 300 बेसहारा महिलाएं रहती हैं. इनके भोजन, स्वास्थ्य, और हर दैनिक जरूरत की देखभाल के लिए 35 सेवादार 24 घंटे समर्पित भाव से कार्य करते हैं. ये सेवादार स्वेच्छा से, बिना किसी स्वार्थ के, अपनी सेवा दे रहे हैं, जो इस आश्रम को और भी खास बना देता है.

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सोनू राणा: एक 24 साल का युवा, जो बन गया है सेवा का प्रतीक

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आश्रम के मुख्य सेवादार, 24 वर्षीय सोनू राणा, इस जगह का प्रमुख चेहरा हैं. उनकी सादगी, मुस्कुराहट, और आत्मीयता हर किसी को अपना बना लेती है. हमारी टीम के साथ पहली मुलाकात में ही सोनू का स्वागत इतना गर्मजोशी भरा था कि लगा जैसे हम सालों से एक-दूसरे को जानते हों. हमारी पहली मुलाकात में सोनू का पहला वाक्य था- आइए प्रभु, अगर मैं आपके लिए कुछ कर पाऊं तो मुझे बेहद खुशी होगी. यह कहते हुए सोनू ने हमें आश्रम की व्यवस्थाएं दिखाईं.

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आश्रम की व्यवस्था: कॉर्पोरेट ऑफिस सा अनुशासन

आश्रम में प्रवेश करते ही सबसे पहले एक सुंदर मंदिर नजर आता है, जहां भगवान विष्णु, राम परिवार, और शिव परिवार की मूर्तियां विराजमान हैं. यहां की साफ-सफाई और व्यवस्था किसी कॉर्पोरेट ऑफिस को टक्कर देती है. भोजन कक्ष में प्रभुजियों की खुशी देखकर मन भर आया. जैसे ही हम वहां पहुंचे, प्रभुजी हमें देखकर ऐसे दौड़े जैसे कोई लंबे समय बाद अपने किसी सगे से मिला रहा हो. वो चेहरे पर मासूम मुस्कान लिए हमसे आकर लिपटने लगे. उनका यह स्नेह और प्रेम इतना गहरा था कि अनायास ही हमारी आंखें भी नम हो गईं.

फंड की पारदर्शी व्यवस्था

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आश्रम का संचालन पूरी तरह पारदर्शिता के साथ होता है. सोनू राणा ने बताया कि कोई भी सेवादार फंड मांगने बाहर नहीं जाता. 'ठाकुरजी खुद व्यवस्था कर देते हैं', सोनू का यह विश्वास आश्रम की हर जरूरत को पूरा करता है. दान देना चाहने वाले व्यक्ति को आश्रम में आकर ही दान देना होता है. चाहे वह एक हजार रुपये हो या एक करोड़, हर दान की राशि चेक या ऑनलाइन माध्यम से ली जाती है, और दानदाता को अपना पैन नंबर दर्ज करना होता है. दान पात्र में 2,000 रुपये से अधिक नकद स्वीकार नहीं किया जाता. यह पारदर्शिता हर किसी को आश्रम के प्रति विश्वास दिलाती है.

जरूरतों को पूरा करती है 'ठाकुरजी की पर्ची' 

आश्रम में हर जरूरत को “ठाकुरजी की पर्ची” के जरिए पूरा किया जाता है. सोनू ने बताया कि जब भी किसी सामान की जरूरत होती है, उसका नाम एक पर्ची पर लिखकर ठाकुरजी के सामने रख दिया जाता है. आश्चर्यजनक रूप से, वह सामान किसी न किसी रूप में आश्रम तक पहुंच जाता है. चाहे वह खाने का सामान हो, कपड़े हों, या कोई अन्य वस्तु, ठाकुरजी की यह अनोखी व्यवस्था आश्रम को सुचारु रूप से चलाने में मदद करती है.

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आश्रम में भर्ती लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए अलग मेडिकल वार्ड

आश्रम में प्रभुजियों के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है. यहां एक अलग मेडिकल वार्ड है, जहां तीन डॉक्टर 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं. अल्ट्रासाउंड मशीन, बीपी मॉनिटर, और अन्य प्राथमिक उपकरण यहां मौजूद हैं. इसके अलावा, प्रभुजियों के लिए एक्सरसाइज उपकरण भी उपलब्ध हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करते हैं.

आश्रम का मिशन

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'अपना घर' का मुख्य मिशन है बिछड़े हुए लोगों को उनके परिवार से मिलाना और जिन्हें अपनों ने त्याग दिया है, उन्हें अपनाना. सोनू राणा ने कई ऐसी कहानियां हमारे साथ साझा कीं, जिन्हें सुनकर हर कोई भावुक हो जाए. 

पहली कहानी: एक मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला की घर वापसी

यह कहानी है एक मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला की, जो कि कभी कभार ही कुछ बोलती थी. यह महिला यूपी के बुलंदशहर जिले की सिकंद्राबाद की रहने वाली थी. मानसिक अस्वस्थता के कारण अपने घर से निकल गई और किसी तरह सोनू राणा से टकराने के बाद उसे अपना घर लाया गया. यहां वो करीब 5 साल तक रही. उधर रंजिश के चलते कुछ लोगों ने महिला के पति पर आरोप लगाया कि उसने अपनी पत्नी को मारकर कहीं दफना दिया. जिसके लिए उसे सजा भी हुई. लेकिन नोएडा में अपना घर में महिला की काउंसिंग की गई और उसने एक दिन अपना पता एक कागज पर लिख दिया. जिसके बाद उस पते पर जाकर छानबीन की गई तो पता लगा कि महिला अचानक रात के समय घर से कहीं चली गई थी. महिला के पति और दोनों बच्चों को आश्रम लाया गया, जहां पूरा परिवार एक-दूसरे ने लिपट कर भावुक हो गया. बाद में आश्रम ने सभी जरूरी कानूनी औपचारिकताएं पूरी करते हुए महिला को उसके परिवार को सौंप दिया.

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दूसरी कहानी: गुजरात की मां की 9 साल बाद घर वापसी

एक अन्य कहानी है एक गुजरात की महिला की जो 9 साल पहले अपने बेटे का साथ दिल्ली आई थी और किसी तरह उससे बिछड़ गई. यह महिला किसी तरह 'अपना घर' पहुंच गई. यहां के सेवादारों के लगातार प्रयत्न के चलते आखिर 9 साल बाद वो सकुशल अपने परिवार के पास पहुंचाई गई.

आपको बता दें कि कुछ मामलों में परिवार ऐसे लोगों अपनाने से इनकार कर देता है, लेकिन आश्रम ऐसे लोगों को अपनी धरोहर समझकर उन्हें आशियाना देता है. उन्हें सम्मानजनक जीवन के साथ-साथ उनकी हर जरूरत का ख्याल भी रखता है.

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'अपना घर' की आत्मा: प्रेम और सेवा भाव

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'अपना घर' आश्रम केवल एक आश्रय स्थल नहीं है, बल्कि यह एक परिवार है, जहां हर 'प्रभुजी' को सम्मान, प्रेम, और अपनापन मिलता है. यहां की हर कहानी, हर व्यवस्था, और हर सेवादार का समर्पण यह साबित करता है कि मानवता अभी भी जिंदा है. सोनू राणा जैसे युवाओं की निस्वार्थ सेवा और ठाकुरजी के प्रति अटूट विश्वास इस आश्रम को एक सच्चा घर बनाता है. यहां हर प्रभुजी की मुस्कान और आश्रम की व्यवस्था हर विजिटर के दिल को छू लेती है.

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