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'नील दर्पण' से 'नया दर्पण': पश्चिम बंगाल में दोहरे शासन की परछाईं

आज पश्चिम बंगाल में वैसी ही तस्वीर उभर रही है, जहां एक ओर संविधान प्रदत्त शासन-प्रशासन और न्यायपालिका, दूसरी ओर राजनीतिक दल की समांतर सत्ता, जो संवैधानिक संस्थाओं की धज्जियां उड़ा रही है. यहां केवल आरोप-प्रत्यारोप का शोर है, संस्थाओं का कोई सम्मान नहीं.

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सुप्रसिद्ध साहित्यकार दीनबंधु मित्र का 1860 में रचित 'नील दर्पण' आज भी प्रासंगिक लगता है. उसमें रॉबर्ट क्लाइव की द्वैध शासन व्यवस्था पर करारा प्रहार है, जो 1765 के पश्चिम बंगाल को स्मरण कराता है. एक ओर नवाब के माध्यम से चल रही शासन प्रणाली, दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कंपनी के हितों के लिए समांतर व्यवस्था, जिसमें भ्रष्टाचार और जनउत्पीड़न चरम पर था. आज पश्चिम बंगाल में वैसी ही तस्वीर उभर रही है, जहां एक ओर संविधान प्रदत्त शासन-प्रशासन और न्यायपालिका, दूसरी ओर राजनीतिक दल की समांतर सत्ता, जो संवैधानिक संस्थाओं की धज्जियां उड़ा रही है. यहां केवल आरोप-प्रत्यारोप का शोर है, संस्थाओं का कोई सम्मान नहीं.

बंगाल में संवैधानिक व्यवस्था बहाल करने के लिए राष्ट्रपति शासन लगे?

नील आन्दोलन को मुखर रूप देने में 'नील दर्पण' ने अहम भुमिका निभाई थी. बिहार के चंपारण से महात्मा गांधी ने नील आंदोलन का प्रारंभ कर इसी दोहरे शासन को चुनौती दी थी. उन्होंने ब्रिटिश कंपनी द्वारा चलाई जा रही समांतर सत्ता पर करार प्रहार किया था और नील किसानों को राहत मिली थी. ठीक वैसे ही, आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब राष्ट्रपति शासन लगाकर संवैधानिक व्यवस्था बहाल करनी चाहिए, या इस दोहरे शासन को अनवरत चलने देना उचित है? गत दिनों कलकत्ता हाईकोर्ट में घटी घटना इसका जीवंत प्रमाण है कि न्यायपालिका पर खुला कुठाराघात हुआ. आर्थिक भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग पर कार्रवाई करने वाली संवैधानिक संस्था प्रवर्तन निदेशालय (ED) के कार्यों में बाधा डालना पश्चिम बंगाल में पुरानी कवायद है. लेकिन इस बार संविधान की शपथ ले चुकीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईडी के रेड वाली जगह पर पहुंचकर फाइलें, लैपटॉप, पेन ड्राइव और हार्ड डिस्क ले लीं. जांच स्थल पर उनके साथ राज्य पुलिस प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारी भी पहुंचे थे, मानो ED कोई अवैध संस्थान हो और गलत कार्य कर रहा है. सच यह है कि ED कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में छापेमारी कर रही थी.

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बंगाल सरकार की फाइलें प्राइवेट कंपनी के दफ्तर में क्यों?

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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ममता बनर्जी के साथ आए पुलिस अधिकारियों ने तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी राजनीतिक सलाहकार कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) के कार्यालय और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के आवास से ढेर सारी फाइलें ले लीं. संभवतः उनमें सरकारी रिपोर्ट भी शामिल थी. सवाल वाजिब है कि राज्य सरकार की गोपनीय फाइलें TMC से संबद्ध राजनीतिक कंपनी के पास क्या कर रही थीं?

ED ने ममता बनर्जी के हस्तक्षेप के खिलाफ तत्काल सुनवाई की मांग की. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल ने याचिका खारिज करते हुए एजेंसी के वकील धीरज त्रिवेदी से कहा था कि नियुक्त न्यायाधीश द्वारा तारीख तय होने के बाद तत्काल सुनवाई का दबाव उचित नहीं. फिर I-PAC और ED दोनों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं. सुनवाई शुरू होते ही कोर्ट रूम में टीएमसी कार्यकर्ताओं की फौज उमड़ पड़ी. भारी भीड़ ने बेंच को राजनीतिक रैली का मंच बना दिया. हालात बिगड़ते देख जस्टिस सुव्रा घोष ने कोर्ट से उठकर निकल जाना बेहतर समझा.

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उनके आदेश में स्पष्ट है कि यदि वकीलों और अन्यों की भीड़ हंगामा न करती, तो दोनों याचिकाओं पर निर्धारित समय पर सुनवाई हो जाती. अदालत की मर्यादा बनाए रखने के अनुरोध अनसुने रहे. हाईकोर्ट अधिकारियों और कोलकाता पुलिस के एक अधिकारी ने भीड़ का कुछ हिस्सा हटाया, किंतु शोर थमा नहीं. जस्टिस घोष ने कहा, 'मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा'. नतीजा ये हुआ कि कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी. ईडी की याचिका में डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस आयुक्त मनोज वर्मा पर डिजिटल उपकरणों की चोरी, सबूत नष्ट करने और केंद्रीय अधिकारियों को गैरकानूनी हिरासत में लेने का आरोप है. ममता की याचिका में ईडी पर BJP के इशारे पर काम करने और चुनावी डेटा हथियाने का इल्जाम लगाया गया.

बंगाल में संवैधानिक संस्थाओं पर 'हमला' नई बात नहीं!

ऐसी घटनाएं पश्चिम बंगाल में कोई नई नहीं है. ममता शासनकाल में संवैधानिक संस्थाओं पर बार-बार प्रहार हुए हैं. 5 जनवरी 2024 को संदेशखाली कांड के मास्टरमाइंड पूर्व टीएमसी नेता शाहजहां शेख के घर ED की रेड के दौरान पर कार्यकर्ताओं ने एजेंसी के अधिकारियों पर हमला किया, लैपटॉप समेत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तोड़ दिए. सितंबर 2025 में कोलकाता में सेना के रूटीन अभ्यास के दौरान टीएमसी का मंच हटाने पर ममता ने केंद्र पर सेना दुरुपयोग का आरोप लगाया. पूर्व सैन्य अधिकारियों ने सड़कों पर उतरकर उनके बयानों की निंदा की.

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कानून सबके लिए बराबर?

पश्चिम बंगाल में संवैधानिक टकराव की यह रस्साकशी, एक ओर ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसी, दूसरी ओर राज्य पुलिस, बीच में हाईकोर्ट, केंद्र-राज्य संबंधों की खींचतान, फेडरल ढांचे बनाम राजनीतिक ताकत का केस स्टडी बन सकती है.

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असल सवाल यह है कि क्या यह मनी लॉन्ड्रिंग या राजनीतिक डेटा की लड़ाई है, या सत्ता का संदेश कि 'हमारे खिलाफ' जाने वाली एजेंसियों को कोर्ट में सांस भी न लेने देंगे? भारत में कानून सबके लिए बराबर है, या शक्तिशाली के लिए न्याय भीड़ और दबाव की शर्तों पर? जनता को उत्तर देना होगा. ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन ही एकमात्र उपाय दिखता है, ताकि संविधान की रक्षा हो सके.
लेखक: अखिलेश सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक, आर्थिक एवं भू-राजनीतिक विश्लेषक

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