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सपने चकनाचूर हो गए, ख्वाहिश अधूरी रह गई, ये फैसला करोड़ों हिंदुस्तानियों की उम्मीदों पर 'Strike' है
इतना अच्छा मौक़ा था. PoK वापस लेना था. पाकिस्तान को सबक सिखाना था. अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है कि हमने सीजफायर करा दिया. कौन है अमेरिका? कौन होता है वो फ़ैसला सुनाने वाला? ट्रंप ने भारत के बयान से पहले क्यों Tweet किया?
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हर भारतीय आज रो रहा है. गमजदा है, मायूस है, उदास है, परेशान है. सवाल हज़ार हैं. जवाब कुछ नहीं. इतना अच्छा मौक़ा था. PoK वापस लेना था. पाकिस्तान को सबक सिखाना था. आतंक की कमर तोड़नी थी. जैश को जनाजे तक पहुंचाना था. लश्कर की लाश उठाने थी. हिजबुल की हैवानियत को दोज़ख़ में पहुंचाना था. मगर सब ख्वाब अधूरे रह गए. पाकिस्तान गिड़गिड़ाया और हमने क्षमा कर दिया. अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है कि हमने सीजफायर करा दिया. कौन है अमेरिका? कौन होता है वो फ़ैसला सुनाने वाला? ट्रंप ने भारत के बयान से पहले क्यों Tweet किया? क्या सुपरपावर ने अपनी औक़ात बताई? हमने उसकी क्यों सुनी?
हमारी बहन-बेटियों का सुहाग उजाड़ने वाला चैन की सांस ले रहा है. कल तक atom bomb की धमकी देने वाले पाकिस्तानी, आँसू दिखाकर करोड़ों हिंदुस्तानी के सपनों पर पानी फेर चुके हैं. इस बार हमें जंग नहीं रोकनी थी. भारत का बच्चा-बच्चा साथ था. हमें अपना पूरा कश्मीर चाहिए था. पाकिस्तान ने जिसे 1947 में धोखे से चुराया था, उसे वापस लेना था. उसे छीनना था. चाहे जितना भी जोर लगता, जितना भी खर्च होता, जितना भी शहादत होती, जितना भी नुक़सान होता, और चाहे जितना भी मारना-काटना पड़ता, हमें PoK की वापसी तक रुकना नहीं चाहिए था.
हर हिंदुस्तानी आस लगाकर देख रहा था कि PoK में भारत की फौज तिरंगा लहराएगी. हिंदुस्तानी वहाँ सांसद बनेंगे. काम करेंगे. जन्नत को जन्नत बनायेंगे. दुनिया को दिखाएंगे. मगर सपने सुहाने बनकर रह गए. भारत के गाँव हो या शहर, गली हो या मोहल्ला, पहाड़ हो या मैदान, हर तरफ़ एक खामोशी है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक बेचैनी है. गुजरात से अरुणाचल तक लोग दुखी हैं. क्योंकि सबकी ख्वाहिशों को पंख लगने से पहले ही एक फ़ैसले ने नोंच डाला. कोई नहीं उड़ पाया. ये नहीं होना था. सीजफायर का फ़ैसला नहीं होना था. इस बार पाकिस्तान को नक्शे से ख़त्म करना था. ये फ़ैसला नहीं होना था.
हमारी बहन-बेटियों का सुहाग उजाड़ने वाला चैन की सांस ले रहा है. कल तक atom bomb की धमकी देने वाले पाकिस्तानी, आँसू दिखाकर करोड़ों हिंदुस्तानी के सपनों पर पानी फेर चुके हैं. इस बार हमें जंग नहीं रोकनी थी. भारत का बच्चा-बच्चा साथ था. हमें अपना पूरा कश्मीर चाहिए था. पाकिस्तान ने जिसे 1947 में धोखे से चुराया था, उसे वापस लेना था. उसे छीनना था. चाहे जितना भी जोर लगता, जितना भी खर्च होता, जितना भी शहादत होती, जितना भी नुक़सान होता, और चाहे जितना भी मारना-काटना पड़ता, हमें PoK की वापसी तक रुकना नहीं चाहिए था.
हर हिंदुस्तानी आस लगाकर देख रहा था कि PoK में भारत की फौज तिरंगा लहराएगी. हिंदुस्तानी वहाँ सांसद बनेंगे. काम करेंगे. जन्नत को जन्नत बनायेंगे. दुनिया को दिखाएंगे. मगर सपने सुहाने बनकर रह गए. भारत के गाँव हो या शहर, गली हो या मोहल्ला, पहाड़ हो या मैदान, हर तरफ़ एक खामोशी है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक बेचैनी है. गुजरात से अरुणाचल तक लोग दुखी हैं. क्योंकि सबकी ख्वाहिशों को पंख लगने से पहले ही एक फ़ैसले ने नोंच डाला. कोई नहीं उड़ पाया. ये नहीं होना था. सीजफायर का फ़ैसला नहीं होना था. इस बार पाकिस्तान को नक्शे से ख़त्म करना था. ये फ़ैसला नहीं होना था.
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