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कुर्सी, जीप और बेफिक्र बादशाह – एक देसी तस्वीर, जो नेताओं के मुंह पर तमाचा है!

"राज करो नेताओं, मैं तो कुर्सी पर ही राजा हूं!" काश हमारे देश के नेता भी कुर्सी को इस लड़के की तरह कुर्सी रहने देते, इसे खेल न बनाते. चलती पिकअप गाड़ी में कुर्सी पर बेफिक्र बैठे इस लड़के की बेफिक्री बहुत कुछ कहती है.

कुर्सी, जीप और बेफिक्र बादशाह – एक देसी तस्वीर, जो नेताओं के मुंह पर तमाचा है!
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राजनीति में कुर्सी वो चीज़ है, जो कभी किसी को चैन से बैठने नहीं देती… और एक ये छोरा है, जो कुर्सी पर बैठकर पूरी सियासत को चैन सिखा रहा है! सड़क पर चलते वक्त आपने कभी-कभी अजीबोगरीब नज़ारे देखे होंगे – कोई बकरी स्कूटी पर, कोई छाता लेकर बाइक चला रहा हो… लेकिन हाल ही में एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने पूरे देश के नेताओं की कुर्सी-प्रेम को नंगा कर दिया!

एक पुरानी, उखड़ी हुई मालवाहक जीप… और उस जीप के पीछे खुली ट्रॉली में एक लड़का… आराम से कुर्सी पर बैठा है.
ना बेल्ट का डर, ना बैलेंस का डर, ना ट्रैफिक का टेंशन – बस एक हाथ आराम कुर्सी की बाहों पर, और नज़रों में वो ठसक… जैसे कह रहा हो:

"राज करो नेताओं, मैं तो कुर्सी पर ही राजा हूं!"
कुर्सी का वो खेल, जो राजनीति को पागल कर देता है
हमारे देश की राजनीति में "कुर्सी" कोई साधारण चीज़ नहीं.

ये एक सपना है…एक शतरंजी मोहरा… और कभी-कभी तो सीधा संविधान से बड़ा लालच.
कभी MLAs गोवा भेजे जाते हैं, ताकि वे किसी और को वोट न दे दें, कभी मंत्री आधी रात को राष्ट्रपति से मिलते हैं, ताकि कुर्सी न चली जाए, कभी गठबंधन ऐसे टूटते हैं, जैसे WhatsApp ग्रुप में झगड़े के बाद Left देखा हो, कुर्सी के लिए लोग पार्टी बदलते हैं, जाति जोड़ते हैं, इतिहास तोड़ते हैं – और अगर ज़रूरत पड़े तो अपना ही घोषणापत्र खा जाते हैं.

लेकिन इस छोरे का क्या कहना…अब आप इस लड़के को देखिए…न कोई दल है, न कोई नकाब, न कोई नारा, न कोई चुनाव चिन्ह बस कुर्सी है, और हवा है!
इस तस्वीर में वो मज़ा है, जो किसी राजनेता की जीत वाली तस्वीर में नहीं. उसके बैठने का अंदाज़ ऐसा है जैसे कह रहा हो – नेताजी, आप लोगों ने कुर्सी को सत्ता बना दिया… हमने तो इसे सुकून बना दिया! इस तस्वीर को देख कर ये समझ आता है कि असली ताकत कुर्सी में नहीं, उसे 'कैसे' और 'किस सोच' से इस्तेमाल किया जाता है – उसमें है. नेताओं के लिए कुर्सी मतलब – VIP सिक्योरिटी, लाल बत्ती, भाषण और भूल जाना कि जनता भी है! पर इस छोरे के लिए कुर्सी का मतलब है – हवा, आराम, और थोड़ी बहुत स्टाइल, क्या नेताओं को सीख लेनी चाहिए? बिल्कुल, इस लड़के की तरह आराम से बैठना कोई नेता क्यों नहीं सीखता? क्यों सत्ता मिलते ही वे लपक कर कुर्सी पर ऐसे चिपक जाते हैं, जैसे पुराने पंखे में धूल! कुर्सी स्थायी नहीं होती, पर इंसान का किरदार होता है. अगर हमारे नेता किरदार से बड़े हो जाते, तो कुर्सी के लिए लड़ाई नहीं, सेवा होती.

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ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो या न हो…
पर ये एक गहरा सवाल छोड़ती है: 

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क्या हमारे नेता भी कभी इस लड़के की तरह कुर्सी पर सिर्फ बैठ पाएंगे –
बिना लालच, बिना टेंशन, बिना एजेंडा? या फिर सत्ता की इस रेस में, वो सिर्फ 'कुर्सी के गुलाम' बनकर रह जाएंगे?

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