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‘शहजादे’ के नाम एक और हार… चुनावी जंग से पहले ही मैदान छोड़ने की नीति ने किया बंटाधार!

कांग्रेस की हार की लिस्ट में अब बिहार भी जुड़ गया. बिहार में कांग्रेस ने 60 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और जीत महज 6 सीटों पर हासिल की. राहुल गांधी भले ही कांग्रेस के अध्यक्ष न हों लेकिन बिहार की हार का सेहरा उन्हीं के सिर पर सज रहा है.

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EVM, अडाणी-अंबानी के बाद वोट चोरी. राहुल गांधी ने बिहार में अपने कैंपेन को इसी मुद्दे के इर्द गिर्द सीमित कर दिया. कथित वोट चोरी के दावे के साथ राहुल गांधी ने पूरा बिहार भ्रमण किया. माना जा रहा था ये यात्रा, कांग्रेस के लिए गेमचेंजर बन सकती है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. बिहार में भी कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद शर्मनाक रहा. इसी के साथ राहुल गांधी के नेतृत्व पर एक ओर हार का दाग लग गया. 

बिहार में कांग्रेस ने 60 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और जीत महज 6 सीटों पर हासिल की. राहुल गांधी भले ही कांग्रेस के अध्यक्ष न हों लेकिन बिहार की हार का सेहरा उन्हीं के सिर पर सज रहा है. लगातार खराब प्रदर्शन के बीच भी कांग्रेस के कुछ नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का चेहरा मानते हैं. जबकि सच्चाई ये है कि पिछले कई सालों से पार्टी उनकी अगुवाई में खराब, और खराब और बेहद ही खराब प्रदर्शन कर रही है. कभी वह गठबंधन का सहारा लेती है तो कभी अकेले मैदान में उतरती है. राहुल गांधी वास्तव में करना क्या चाहते हैं ये जनता तो क्या? कांग्रेस के भीतर भी कई नेता और कार्यकर्ता नहीं समझ पा रहे. 

20 साल मेें कांग्रेस की 95 हार

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कांग्रेस की हार की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है. अमूमन हर साल कोई न कोई राज्य इसमें जुड़ ही जाता है. इनमें से ज्यादातर ऐसे राज्य हैं जहां राहुल गांधी अगुवाई कर चुके हैं. बिहार भी इसी लिस्ट का हिस्सा है. कांग्रेस के ‘हाथ’ से जनाधार निकलता जा रहा है. पिछले 20 साल में कांग्रेस ने 95 हार का मुंह देख लिया. हालांकि इनमें से ऐसे कई राज्य हैं जिनमें कांग्रेस ने वापसी भी की है. लेकिन जिन राज्यों में कांग्रेस का अच्छा खास जनाधार थो वो खोता चला गया. 

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हाल के कुछ राज्यों कांग्रेस के प्रदर्शन पर एक नजर 

साल 2021- असम, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी 
साल 2022- उत्तर प्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब 
साल 2023- राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, नागालैंड
साल 2024- महाराष्ट्र, हरियाणा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश
साल 2025- दिल्ली, बिहार

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हालांकि कई ऐसे भी राज्य हैं जहां कांग्रेस की गठबंधन पार्टियों ने जीत दर्ज की है लेकिन अपने दम पर कांग्रेस ने कुछ ही राज्यों में जगह हासिल की है. इनमें तेलंगाना और कर्नाटक हालिया उदाहरण हैं. वहीं, ये दोनों दक्षिणी राज्य हैं जहां BJP की स्थिति कभी भी बहुत अच्छी नहीं रही. यहां कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का ही प्रभाव रहा. 

राजस्थान से रार मिटाने आए अशोक गहलोत, राहुल रहे गायब

राहुल गांधी राज्य तो क्या संगठन बचाने में भी विफल रहे हैं. NDA दलों के बढ़ते उभार के बीच कांग्रेस में नेतृत्व का संकट गहरा जाता है तो कभी संगठन में खींचतान चलती रहती है. पार्टी के भीतर ही मतभेदों को दूर करने में राहुल गांधी विफल रहे हैं. बिहार में चुनाव के आखिरी समय तक कांग्रेस अपनी स्ट्रेटजी को लेकर क्लियर नहीं थी. गठबंधन के दल भी ये बात समझ नहीं पा रहे थे. फिर आखिरी समय में राजस्थान से अशोक गहलोत आते हैं और रायता समेटते हुए तेजस्वी को CM उम्मीदवार बनाने पर मुहर लगाते हैं. उस समय राहुल गांधी क्या कर रहे होते हैं? ये कोई नहीं जानता. चुनाव के कुछ महीनों पहले तक पदयात्रा करने वाले राहुल चुनाव के मौके पर गायब हो जाते हैं. इससे कार्यकर्ताओं में ये संदेश जाता है कि पार्टी के शीर्ष लीडर ही हार मान चुके हैं. ऐसे में कार्यकर्ताओं का जोश और जीत के हौंसले दोनो पस्त हो जाते हैं. 

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कांग्रेस की हर हार में एक कॉमन बात क्या है? 

किसी भी चुनावी राज्य में कांग्रेस की एक ही तरह की स्ट्रेटजी नजर आती है वो क्या? किसी को नहीं पता, लेकिन एक चीज कॉमन रहती है पार्टी में कलह, गठबंधन के दलों के साथ असहमति और गलत चेहरों पर दांव. गुजरात में पार्टी की बैठक के दौरान राहुल गांधी ने कहा था, कांग्रेस को समझना होगा रेस के घोड़े कौनसे हैं और शादी के घोड़े कौनसे हैं? कांग्रेस को अब रेस के घोड़ों पर दांव लगाना होगा, लेकिन इस बयान के कई महीनों बाद भी राहुल अपने इस मंत्र को धरातल पर नहीं उतार पाते. 

राहुल गांधी के नेतृत्व में राजनीतिक नक्शे से कांग्रेस का वजूद लगातार मिटता जा रहा है. राहुल गांधी जब किसी चुनाव की कमान संभालते हैं तो ऐसा लगता है मुद्दों की नहीं विचारों की लड़ाई है. पार्टी इतनी कमजोर होती जा रही है कि क्षेत्रीय दल भी इससे अच्छी स्थिति में हैं. 

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बिहार ने भी दी चेतावनी, क्या करेंगे राहुल? 

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हर बार की तरह बिहार की हार को भी कांग्रेस के लिए बड़ा सबक माना जा रहा है, लेकिन ये सबक से ज्यादा चेतावनी है. चेतावनी नेतृत्व में बदलाव की, चेतावनी राहुल को फ्रंट फेस न बनाकर पार्टी की वरिष्ठ, मजबूत और युवा ताकतों को आगे लाने की, चेतावनी गांधी परिवार की छवि से पार्टी को बाहर निकालकर असल मुद्दों पर दम भरने की, गठबंधन के दलों के साथ तालमेल की और सगंठनात्नक संरचना को नए स्तर से शुरू करने की. 

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