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बिहार चुनाव परिणाम में देशज पसमांदा मुसलमान कैसे बने NDA की जीत का निर्णायक फैक्टर, लेखक डॉ फैयाज अहमद फैजी ने बताई वजह

Bihar Election Result 2025: बिहार चुनाव नतीजों ने मुस्लिम राजनीति के पुराने मिथक तोड़ दिए हैं. कई मुस्लिम-बहुल सीटों पर NDA की अप्रत्याशित जीत का बड़ा कारण पसमांदा मुसलमानों का राजनीतिक पुनर्संयोजन है.

Yogi Adityanath
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बिहार विधानसभा चुनावों के हालिया नतीजों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की राजनीति को समझने के लिए पसमांदा मुसलमानों की सामाजिक एवं सार्थक भूमिका को समझना बेहद ज़रूरी है. लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में चुनावी रुझान एकतरफ़ा होते हैं, लेकिन इस बार बिहार की कई मुस्लिम-बहुल सीटों पर बीजेपी और NDA उम्मीदवारों की अप्रत्याशित जीत ने इस पुराने राजनीतिक मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया. इन नतीजों के केंद्र में पसमांदा समाज का नया राजनीतिक पुनर्संयोजन दिखाई देता है.

मुस्लिम राजनीति को लेकर टूट भ्रम 

बिहार चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं था, बल्कि यह उन आवाज़ों के उद्भव का चुनाव था जो दशकों से हाशिये पर थीं. मुस्लिम राजनीति को 'एकरूप' मानने का जो भ्रम भारतीय राजनीति में लंबे समय से कायम था, वह अब टूटता दिख रहा है. इस बदलाव के केंद्र में देशज पसमांदा समाज है, जो पहचान-आधारित राजनीति के बजाय अधिकार, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय पर आधारित राजनीतिक चेतना का स्वर बन चुका है.

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पसमांदा समाज में बढ़ी हतशा 

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NDA को मिले समर्थन का सबसे बड़ा कारण पसमांदा समाज की वोटिंग प्रवृत्ति में आया यह ठोस बदलाव है. पुराने 'मुस्लिम वोट बैंक' ढांचे से मोहभंग और पारंपरिक नेतृत्व, विशेषकर अशराफ प्रभुत्व वाली राजनीति से असंतोष ने पसमांदा तबके को नए राजनीतिक विकल्पों की ओर प्रेरित किया. कई वर्षों से राजनीतिक दल मुस्लिम समुदाय के भीतर केवल अशराफ वर्ग को वरीयता देते रहे, जिससे पसमांदा समाज में हताशा और निराशा दोनों बढ़ीं.

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NDA को मिला पसमांदा समाज का साथ 

पसमांदा समाज ने इस चुनाव में पारंपरिक राजनीति को दरकिनार करते हुए NDA गठबंधन को समर्थन देना शुरू किया. इसके पीछे कई सामाजिक, नीतिगत और राजनीतिक कारण थे. बिहार की सामाजिक न्याय वाली राजनीति ने, विशेषकर पिछड़ा-अतिपिछड़ा वर्ग की नीतियों और शैक्षणिक-कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से, पसमांदाओं को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया. यही कारण है कि नितीश कुमार पर पसमांदा समाज में एक ठोस भरोसे का आधार तैयार हुआ.

मुस्लिम को मिला योजनाओं का सीधा लाभ 

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नितीश कुमार की सरकार ने मुसलमानों को 'एकसमान ब्लॉक' मानने की प्रवृत्ति को तोड़ते हुए पसमांदा केंद्रित नीतियों पर काम किया. पिछड़ा-अतिपिछड़ा वर्ग की योजनाएँ, छात्रवृत्तियाँ, आवास और शिक्षा योजनाएँ, कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम इन सबने पसमांदा समाज को सीधे लाभ पहुँचाया. इसी के साथ पसमांदा आंदोलन के साथियों ने अशराफ प्रभुत्व वाली राजनीति पर लगातार सवाल उठाए और वास्तविक सामाजिक प्रतिनिधित्व की मांग की. जेडीयू का सामाजिक न्याय आधारित राजनीतिक इतिहास NDA के लिए एक सकारात्मक कारक के रूप में उभरा. बीजेपी ने भी पिछले वर्षों में पसमांदा वर्ग के साथ संवाद बढ़ाया और उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में पसमांदा समाज से आने वाले दानिश आजाद अंसारी को मंत्रिमंडल में स्थान दिया. मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी का बिहार चुनाव में प्रचार करना काफी सकारात्मक साबित हुआ. उनकी राजनीतिक पहचान और सफलता ने बिहार के पसमांदा समाज के युवाओ को आकर्षित काफी आकर्षित किया  जिस कारण NDA प्रत्याशियों के पक्ष में  निर्णायक वोट शिफ्ट हुए.

NDA की तरफ क्यों गया पसमांदा समाज?

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केंद्र सरकार द्वारा वक्फ बोर्डों में पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास और वक्फ बोर्ड में देशज पसमांदा समाज के लिए सीटें आरक्षित करने से पसमांदा समुदाय में एक सकारात्मक संदेश गया. पसमांदा समाज ने यह महसूस किया कि सत्तारूढ़ गठबंधन, विशेषकर JDU और BJP, उनके मुद्दों और आवश्यकताओं को प्राथमिकता दे रहा है. चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि पसमांदा समुदाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पारंपरिक विपक्षी दलों से दूर हटकर NDA के साथ गया. विश्लेषकों ने इस बदलाव को 'पसमांदा शिफ्ट' नाम दिया है. यद्यपि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अब भी महागठबंधन के साथ रहा, फिर भी अनुमानों के अनुसार लगभग 10–15% पसमांदा वोट NDA के पक्ष में गए. यह प्रतिशत भले कम प्रतीत हो, लेकिन बिहार चुनाव में यह एक ऐतिहासिक मोड़ और निर्णायक परिवर्तन साबित हुआ.  देशज पसमांदा समाज का यह वेटिंग पैटर्न यह दर्शाता है कि पसमांदा समाज अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की और अग्रसर है.

पसमांदा की विशिष्ट पहचान को स्वीकार करें NDA 

बिहार में NDA के अच्छे प्रदर्शन में कई कारक शामिल थे, लेकिन उनमें से एक प्रमुख कारण पसमांदा समाज की राजनीतिक प्राथमिकताओं में आया परिवर्तन है. उन्होंने विकास, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय पर आधारित राजनीति को चुना और यह स्पष्ट कर दिया कि वे अब मजहबी पहचान-आधारित राजनीति के बजाय अपने वास्तविक सामाजिक-आर्थिक पहचान को प्राथमिकता देंगे. यह बदलाव बिहार के सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और लोकतांत्रिक संतुलन की वास्तविक धुरी बन सकता है. आगामी NDA सरकार के लिए आवश्यक है कि वह पसमांदा की विशिष्ट पहचान को स्वीकार कर  उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जरूरतों को प्राथमिकता देने के साथ साथ सरकार मे भी उचित भागेदारी दें। जब पसमांदा समाज को वह सम्मान, अधिकार और अवसर मिलना चाहिए जिसके वे हकदार हैं, तभी बिहार की राजनीति वास्तव में समावेशी, न्यायपूर्ण और संतुलित मानी जाएगी.

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इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि आने वाले वर्षों में पसमांदा समाज की इस नई राजनीतिक चेतना को स्थिर और मजबूत किया जाए। बिहार की कई सीटों में देखा गया कि पसमांदा समुदाय ने सिर्फ विकास-आधारित मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि, स्थानीय उपस्थिति और उनके कार्य की विश्वसनीयता के आधार पर भी मतदान किया. यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि पसमांदा मतदाता अब केवल मजहबी पहचान की राजनीति से प्रभावित नहीं हो रहें हैं, बल्कि ठोस नीतियों और ज़मीनी काम को प्राथमिकता देने लगा है. इसके अतिरिक्त युवा पसमांदा मतदाताओं में शिक्षा, रोजगार, डिजिटल पहुंच और कौशल विकास जैसी नई आवश्यकताएँ उभर रही हैं. यह तबका अधिक सूचनाप्राप्त, सक्रिय और राजनीतिक रूप से जागरूक है. इसीलिए भविष्य में कोई भी राजनीतिक दल यदि पसमांदा समुदाय का भरोसा कायम रखना चाहता है, तो उसे केवल प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर ठोस नीतिगत पहलें करनी होंगी.

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डॉ फैयाज अहमद फैजी 
लेखक, अनुवादक स्तंभकार मीडिया पैनलिस्ट पसमांदा-सामाजिक कार्यकर्ता एवं आयुष चिकित्सक 

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