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ऑपरेशन सिंदूर के बाद बीजेपी के सामने क्षेत्रीय क्षत्रपों की चुनौती, पीएम मोदी की धुआंधार रैली और बीजेपी के बढ़े आत्मविश्वास की वजह क्या है?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बीजेपी की बढ़ी सक्रियता ने विपक्ष में एक सियासी डर पैदा कर दिया है. सीजफायर के बाद उपजे गुस्से को काउंटर करने के साथ कैसे बीजेपी बंगाल, बिहार और यूपी के तीन बड़े चुनावों में उतरने वाली या फिर उतर चुकी है? कैसे इन राज्यों में जाति और स्थानीय मुद्दों से निपटा जाएगा, उसके संकेत मिलने लगे हैं. यूपी में PDA और संविधान, बिहार में जाति और बंगाल में ममता की चुनौती से निपटने के लिए बीजेपी के पास क्या हथियार हैं, इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं.

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PM मोदी जहां भी जा रहे हैं ऑपरेशन सिंदूर का ज़िक्र करना नहीं भूल रहे. इसी कड़ी में PM मोदी बीते दिनों पश्चिम बंगाल पहुंचे थे. यहां अलीपुरद्वार में उन्होंने जनता को संबोधित किया. ख़ास बात ये थी कि BJP की इस विशाल रैली में पहुंचे कार्यकर्ताओं के हाथों में BJP का कमल वाला झंडा नहीं बल्कि तिरंगा था. PM जैसे ही अपने संबोधन में ऑपरेशन सिंदूर का ज़िक्र करते, कार्यकर्ता जोश से भरते हुए तिरंगा लहराने लगते. भारत माता के जयकारे लगते, PM मोदी के जयकारे लगाने लगते. तो क्या BJP बंगाल में ऑपरेशन सिंदूर से 'सियासी खेला' की प्लानिंग कर रही है? क्या 'सिंदूर' बंगाल में BJP की नई शक्ति बनने जा रहा है. PM मोदी के 32 मिनट के भाषण का सार निकालें तो इशारा ये ही मिल रहा है. वैसे पीएम की बिहार के काराकाट, यूपी के कानपुर और मध्य प्रदेश को भोपाल में हुई रैली भी भारतीय सेना के पराक्रम और पहलगाम के बाद देश के जज्बे के इर्द-गिर्द ही रही.

बंगाल में अगले साल यानी कि 2026 में चुनाव हैं. वहीं बिहार में इसी साल चुनाव होने हैं, जबकि बीजेपी के लिहाज से सबसे बड़ी लड़ाई, 2027 में योगी के उत्तर प्रदेश में होगी. मोदी ने इशारों ही इशारों में साफ कर दिया है कि पार्टी अब फ्रंट फुट पर खेलने जा रही है. अब ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि पीएम की सक्रियता क्यों बढ़ी है? पार्टी और पीएम को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक ऐतिहासिक और अद्भुत समर्थन देश की जनता और विपक्ष से भी मिला. और जैसे ही 10 मई को ट्रंप ने एकतरफा सीजफायर का ऐलान किया, क्रेडिट लेने की कोशिश हुई, उसने प्रधानमंत्री की छवि को गहरा धक्का पहुंचाया. देश में सवाल उठने लगे कि अगर पाकिस्तान पर हम बढ़त बना चुके थे, पाक फौज बैकफुट पर थी तो उसके ताबूत में आखिरी कील ठोकने के बजाय युद्धविराम का ऐलान कर दिया गया. इस पूरे घटनाक्रम और अचानक बदले माहौल ने पूरा परिदृश्य बदल दिया और पीएम की साख पर चोट लगाने की विपक्ष की तरफ से कोशिश हुई. 

ये अलग बात है कि भारत ने जिस मकसद से, सैन्य या रणनीतिक कार्रवाई की थी, उसे हासिल कर लिया गया था. अत: युद्ध को आगे खींचना एक दुनिया की उभरती और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए कहीं से भी सही नहीं था. वो भी एक ऐसे देश के साथ जिससे कोई तुलना नहीं बनती है. जो पहले से ही भीख मांग रहा है, खजाना खाली है, पानी-बिजली की भारी किल्लत है, इकोनॉमी बदहाल और कंगाल है. एक जमीन पर लेट चुके मुल्क से लड़ने का कोई औचित्य नहीं है, युद्ध की कोई जरूरत नहीं है जब टैक्टिकल बैटल में ही आपके सारे गोल अचीव हो गए हों. इस बात से कोई कैसे इनकार कर सकता है कि पहले लड़ाई, मुजफ्फराबाद तक थी, आतंकी पंजाब के इलाके में चैन से सोते थे, फिर उठकर PoK से भारत विरोधी आतंकी गतिविधि को संचालित करते थे. अब इस कार्रवाई के बाद उनके मन में एक खौफ तो भर ही दिया गया है कि वो पाकिस्तान के किसी इलाके में सेफ नहीं हैं, चाहे वो इस्लामाबाद हो, कराची हो या फिर पंजाब का कोई इलाका. पीएम की रैलियौं ने कम से कम ये साबित कर ही दिया है कि ये कार्रवाई कितनी जरूरी थी, क्या अचीव किया गया और जो संदेश और शंका के बादल पैदा किए जा रहे थे उसे दूर कर दिया गया है. 

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जहां तक बिहार, बंगाल, औऱ यूपी के बड़े चुनावों की बात है, तीनों जगह पर अलग-अलग सियासी रणनीति अपनाई जाएगी. बिहार, जहां चुनाव जाति के इर्द-गिर्द ही होता है, वहां के लिए जातिगत जनगणना का ऐलान किया गया. दूसरी तरफ बंगाल में घुसपैठ, सुरक्षा, भ्रष्टाचार और के साथ-साथ राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी रहने वाला है. वहीं अगर यूपी की बात करें तो यहां बीजेपी के लिए जाति एक अभेद्य दीवार की तरह खड़ी हो गई है. लोकसभा चुनाव में देखा गया कि राम मंदिर और राष्ट्रवाद पर संविधान और PDA का नारा हावी रहा. उसे भारी हार का सामना यूपी सहित पूरे देश में उठाना पड़ा. हर पार्टी की अपनी यूएसपी और कोर मुद्दे होते हैं. बीजेपी की USP है हिंदुत्व और राष्ट्रवाद, ऐसे में वो बखूबी जानती है कि अगर वो जाति, जो विपक्ष का मुद्दा है और उनकी राजनीति ही इसी पर चलती है, इस पर खेलने की कोशिश करेगी तो मात खाएगी ही. ऐसे में राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, हिंदुत्व के साथ-साथ वेलफेयर स्कीम आधारित सोशल इजीनियरिंग के मुद्दों का तड़का लगाया जाएगा. पार्टी अपनी रणनीति में बदलाव की गंभीर कोशिश कर रही है.

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हालांकि ममता के सामने बीजेपी की ये लड़ाई आसान नहीं होने वाली है. मोदी के अलीपुरद्वार रैली के ठीक बाद ममता ने करारा पलटवार किया था. कांग्रेस, जो मुख्य विपक्षी है, अब तक अपनी रणनीति नहीं क्लियर कर पाई है कि उसे ऑपरेशन सिंदूर के बाद उपजे माहौल में करना क्या है क्योंकि बीजेपी और ऑपरेशन सिंदूर के विरोध के बीच एक महीन रेखा ही रह गई है, और भगवा पार्टी इस परसेप्शन को क्रिएट करने में कामयाब भी रही है.

BJP के इस सियासी खेला को ममता बनर्जी ने भी भांपते हुए पलटवार किया और आरोप लगाया कि, ऑपरेशन सिंदूर के बहाने BJP सियासी रोटियां सेक रही है. वहीं, मोदी की इसी रैली में बंगाल BJP अध्यक्ष सुकांता मजूमदार ने ऑपरेशन सिंदूर को ऑपरेशन बंगाल से जोड़ दिया, और राज्य से ममता बनर्जी की TMC सरकार को बाहर करने का दावा किया. इसके बाद ये संकेत मिलने लगे कि पार्टी इसका इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगी.

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ममता बनर्जी और विपक्ष के पास वैसे एक चीज है जो देश को दिखाने और बीजेपी को काउंटर करने के लिए है, जैसे कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में बढ़-चढ़कर भाग लेकर उन्होंने साबित करने की कोशिश की है कि विदेश नीति के मुद्दों और राष्ट्रवाद पर बीजेपी का एकाधिकार नहीं है और न होगा. ममता ने याद दिलाया कि ऐसे समय में जब विपक्ष देश के बाहर देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है. देश के हित में काम कर रहा है. तब PM मोदी रैलिया कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि PM मोदी भूल गए कि TMC सांसद ऑपरेशन सिंदूर के उस डेलीगेशन में शामिल हैं जो विदेशी धरती पर आतंक को लेकर पाकिस्तान को बेनक़ाब कर रहे हैं. अब आने वाले समय में देखने वाली बात होगी कि बीजेपी इस मुद्दे को और कैसे भुनाती है और विपक्ष इसका कैसे काउंटर करता है. वैसे बताते चलें कि ऑपरेशन सिंदूर को रद्द नहीं किया गया है और आने वाले समय में अगर सैन्य कार्रवाई होगी तो किसी को कोई आश्चर्य न हो.

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