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Uttarakhand में महादेव का रहस्यलोक ‘लाखामंडल’, जहां मरे इंसान ज़िंदा हो जाते थे!

देहरादून के विकास नगर से चकराता होते हुए हमारी टीम लाखामंडल के रास्ते पर चल पड़ी। सड़क के साथ बहती यमुना नदी इस यात्रा को सुखद और यादगार अनुभव में तब्दील कर देती है। करीब साढ़े तीन घंटे में Being Ghumakkad की टीम देहरादून से लाखामंडल पहुंच सकी।

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काल के कपाल पर विजय तिलकधारी महादेव की ये ऐसी अनोखी दुनिया है, जिसने सतयुग से लेकर त्रेतायुग, त्रेतायुग से लेकर द्वापरयुग और द्वापरयुग से लेकर कलयुग तक को देखा है। यहां मरा हुआ इंसान ज़िंदा हो जाता है! यहां पांडवों के लाक्षागृह के सबूत हैं | यहां शिव की शक्ति के निशान विद्यमान हैं | यहां रहस्यमयी गुफाओं की अबूझ पहेली है |


तो चलिए उत्तराखंड के जौनसार-बावर में मौज़ूद शिवलिंगों के रहस्यमयी स्थान लाखामंडल, जिसकी अब तक बहुत कम जानकारी दुनिया के सामने सकी है। पहले पड़ाव में Being Ghumakkad की ये यात्रा दिल्ली से निकलकर ऋषिकेश और फिर वहां से देहरादून तक पहुंची। यमुनोत्री मार्ग पर देहरादून से लाखामंडल की दूरी है करीब 120 किलोमीटर। देहरादून के विकास नगर से चकराता होते हुए हमारी टीम लाखामंडल के रास्ते पर चल पड़ी। सड़क के साथ बहती यमुना नदी इस यात्रा को सुखद और यादगार अनुभव में तब्दील कर देती है। करीब साढ़े तीन घंटे में Being Ghumakkad की टीम देहरादून से लाखामंडल पहुंच सकी।   

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लाखा का मतलब हैबहुत सारेऔर मंडल का अर्थ है, ‘वो स्थान जहां बहुत सारे लिंगम और मूर्तियां हों तो ऐसे अद्भुत लाखामंडल की समुद्र तल से ऊंचाई करीब 1372 मीटर है। लाखामंडल के मुख्य मंदिर का निर्माण नागर शैली में हुआ है। इसमें बड़े-बड़े पत्थरों और काठ का इस्तेमाल किया गया है। मंदिर को देखकर प्रतीत होता है मानो यहां कुछ काम कत्यूरी शासन के समय भी हुआ होगा। मंदिर में उसी तरह की वास्तुकला है जैसी केदारनाथ में दिखायी देती है। पुरातात्विक साक्ष्य कहते हैं कि लाखामंडल में स्थित मुख्य शिव मंदिर का निर्माण बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में हुआ। लेकिन मंदिर परिसर में ही प्राप्त छठी शताब्दी के एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण सिंहपुर राजघराने की राजकुमारी ईश्वरा ने करवाया। ऐसा माना जाता है कि ये मंदिर राजकुमारी ने अपने पति चंद्रगुप्त जो जालंधर के राजा के पुत्र थे, उनके निधन पर उनकी सद्गति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए बनवाया था। कहा जाता है मुख्य मंदिर की खोज एक गाय ने की। लाखामंडल में सवा लाख शिवलिंग मौज़ूद होने का दावा किया जाता है, जिनमें चारों युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग में बने शिवलिंग भी विद्यमान हैं और हर शिवलिंग अलग रंग और गुणों वाला है। 


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चौथा शिवलिंग यहां से बाहर की तरफ है। मंदिर के अंदर मौज़ूद सतयुग के शिवलिंग के बाद कलयुग की शुरूआत में स्थापित माने जाने वाले इस शिवलिंग की अपनी खासियत है। ये शिवलिंग अष्टदल पर बना है। इसके 8 कोने हैं।लाखामंडल परिसर में एक विशेष गोल घेरा है। जो एक विशेष मंत्र क्रिया के लिए जाना जाता रहा है। दावा किया जाता है, इस गोल घेरे पर किसी मुर्दा व्यक्ति को अगर रख दिया जाता था, तो वो कुछ वक्त के लिए दोबारा जीवित हो जाता था।


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माना जाता है जिन दो मूर्तियों के बीच में मुर्दे को ज़िंदा करने का अनुष्ठान किया जाता था, वो भी सदियों से पश्चिम दिशा की ओर मुंह कर लाखामंडल में यूंही खड़ी हैं। हालांकि अब ये मूर्तियां खंडित प्रतीत होती हैं। इन दोनों मूर्तियों को हर युग में अलग पहचान के रूप में देखा गया है। इसके पीछे की पौराणिक कथा के मुताबिक राजा दक्ष ने यहीं पर विशाल हवन का आयोजन किया। जिसमें मां सती का अपमान हुआ और उन्होंने हवन कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। जिसके बाद क्रोधित महादेव शिव ने अपने शरीर को मला जिससे यही दो रूप वीर और भद्र प्रकट हुए।


यहीं पर उस स्थान के होने का दावा स्थानीय और पुजारीगण करते हैं, जो महाभारत के युद्ध से पहले बहुत बड़ी घटना मानी गयी। दावा किया जाता है इसी लाखामंडल में ही लाक्षागृह बनाया गया। जिसमें पांडवों को ज़िंदा जलाकर मारने की साज़िश दुर्योधन ने रची, लेकिन श्रीकृष्ण की मदद और विदुर की नीति से पांडवों ने दुर्योधन को मात दे दी और वो यहां से एक सुरंग के जरिए बच निकले। उस सुरंग का एक सिरा लाखामंडल गांव के बाहर आज भी खुलता है।

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हालांकि लाक्षागृह होने के दावे देश के कई अलग-अलग स्थानों पर किए जाते हैं। इन दावों के इतर Being Ghumakkad ने उस सुरंग को ढूंढने का फैसला किया, जिसके बारे में दोनों ही पुजारियों ने हमें बताया था। इस गुफा को गुप्तेश्वर महादेव की गुफा भी कहते हैं, जो मंदिर परिसर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर Being Ghumakkad को मिल गयी। जैसा पुजारियों ने बताया, गुफा के अंदर सूक्ष्म रूप में स्वयंभू महादेव विराजे हैं। इसके अलावा गुफा से अलग-अलग दिशाओं में रास्ते निकलते हुए प्रतीत होते हैं। माना जाता है कालांतर में गुफाओं के ये रास्ते बंद हो गए। लाखामंडल दो मुरादें पूरी होने के लिए भी प्रसिद्ध है। पहली किसी की रुकी हुई शादी। दूसरी अगर किसी दंपत्ति को गोद सूनी हो तो।


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लाखामंडल में साल 2007 में पुरातत्व विभाग ने खुदाई की, तब यहां काफी मात्रा में शिवलिंग और पुराने मंदिरों के अवशेष निकले। मंदिर के आस-पास तीन-चार सौ मीटर तक अक्सर कोई ना कोई अवशेष निकलता ही रहता है। इसलिए इस जगह की महत्ता दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। केदारनाथ के दर्शनों से पहले लाखामंडल के दर्शनों की महत्ता भी मानी जाती है। रोज़ शाम को 7 बजे लाखामंडल के मुख्य मंदिर में आरती की जाती है, जिसमें स्थानीय लोग शामिल होते हैं। रात 8 बजे के बाद मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। अगर आप लाखामंडल जाना चाहें तो 132 किलोमीटर दूर देहरादून के जॉलीग्रांट में नज़दीकी एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून रेलवे स्टेशन करीब 118 किलोमीटर दूर है। अक्टूबर-नवंबर और मार्च-अप्रैल यहां की घुमक्कड़ी और धार्मिक यात्रा का सबसे उचित समय है।

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