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Delhi के पास स्थित औघड़नाथ मंदिर जिसका 1857 की क्रांति से है रिश्ता

इस मंदिर को काली पल्टन वाले शिव मंदिर के नाम से भी जानते हैं। काली पलटन नाम पड़ने की भी एक कहानी है। मंदिर का इतिहास कई सौ साल पुराना है। ब्रिटिश काल से यहां सेना से जुड़ा कैंट एरिया था। तब अंग्रेज़ अधिकारी यहां भारतीय सोल्जर्स को काली पलटन या ब्लैक आर्मी के नाम से बुलाते थे। इस मंदिर ने 1857 में आज़ादी की पहली क्रांति को बेहद क़रीब से देखा और महसूस किया है।

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जितने कंकड़ उतने शंकर

हर कंकड़ पर है शिव का नाम

शिव का एक बहुत रहस्यमयी नाम और दुनिया के सबसे छोटे स्वयंभू शिवलिंग में शुमार है औघड़नाथ शिवलिंग, जो डेढ़ इंच से ज्यादा नहीं।

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आखिर क्या है इस शिवलिंग की खूबी? इस शिवलिंग से अंग्रेज़ भी क्यों थर-थर कांप उठे? इसी औघड़नाथ धाम से कैसे जुड़ा है 1857 की क्रांति का इतिहास? मंदिर में मौज़ूद 200 साल पुराने कुएं की क्या चमत्कारी कहानी है? और क्यों किसी भी युद्ध पर जाने से पहले सैनिक औघड़नाथ महादेव के मंदिर में मत्था टेकते हैं? ऐसे सभी सवालों के जवाब की तलाश में Being Ghumakkad राजधानी दिल्ली के बेहद करीब मेरठ शहर की ओर निकल पड़ा।


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जी हां, मेरठ ही वो शहर है, जहां से 1857 की क्रांति का बिगुल बजा और आज़ादी की उस मशाल को सुलगते देखा मेरठ के कैंट इलाके में स्थित औघड़नाथ मंदिर ने। करीब सवा घंटे के सफर के बाद Being Ghumakkad की टीम मंदिर के सामने थी। इलाका बेहद संवेदनशील है। इसलिए यहां कैमरा बड़ी सावधानी से चलाना पड़ता है। मंदिर बहुत ऊंचा है। इसकी ऊंचाई 100 फीट से ज्यादा है। जैसे ही मंदिर के अंदर आते हैं, तो बाईं ओर बने शू स्टैंड में जूते-चप्पल आदि रखने होते हैं। इसके बाद यहां से अंदर पहुंचा जाता है। Being Ghumakkad ने मंदिर की दीवारों के नज़दीक जाकर देखा तो पता चला पूरा मंदिर संगमरमर से बना हुआ है। मंदिर में प्रवेश करते ही एक जगह पर आपको तांबे और स्टील के कलश दिखाई देंगे। जिनसे आप महादेव पर जल चढ़ा सकते हैं। यहीं पर चंदन घिसने की व्यवस्था भी है।


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इस मंदिर को काली पल्टन वाले शिव मंदिर के नाम से भी जानते हैं। काली पलटन नाम पड़ने की भी एक कहानी है। मंदिर का इतिहास कई सौ साल पुराना है। ब्रिटिश काल से यहां सेना से जुड़ा कैंट एरिया था। तब अंग्रेज़ अधिकारी यहां भारतीय सोल्जर्स को काली पलटन या ब्लैक आर्मी के नाम से बुलाते थे। इस मंदिर ने 1857 में आज़ादी की पहली क्रांति को बेहद क़रीब से देखा और महसूस किया है।


कहा जाता है इसी चांदमारी में जो कारतूस भारतीय सैनिक इस्तेमाल करते थे। उनमें गाय और सुअर की चरबी का इस्तेमाल होता था। उस कारतूस के बारे में जब सैनिकों को पता चला तो, सैनिकों के खून में उबाल गया। और फिर जो हुआ, वो आज़ादी का गौरवमयी इतिहास है। कहते हैं सैनिकों के दिल में जल रही चिंगारी को ज्वाला बनाने का काम किया इसी मंदिर में बैठने वाले और उस वक्त के एक रिटायर्ड फौजी बाबा शिवचरण ने। औघड़नाथ मंदिर की चर्चा सन 1857 की क्रांति से हुई। तब इस इलाके में जंगल हुआ करता था। कहा जाता है तब इस मंदिर में स्वतंत्रता सेनानी भारतीय पलटन के अधिकारियों से सीक्रेट मीटिंग किया करते थे। सैनिकों को इस मंदिर में मौज़ूद बाबा कुएं से खींचकर पानी पिलाया करते थे। कहते हैं, यहीं पर बातचीत के दौरान कारतूस में गाय औऱ सुअर की चर्बी के इस्तेमाल की बात पता लगी। और सैनिकों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह कर दिया |

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कुएं के सामने के भाग को एक मेमोरियल का रूप दिया गया है। इसे और भी भव्य रूप देने की कोशिश की जा रही है। वहीं इस ऐतिहासिक कुएं को आम-जनमानस के लिए बंद कर दिया गया है। मंदिर के गर्भगृह के दरवाज़े चांदी के बने हैं जिन पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। यहां से अंदर प्रवेश करने के तीन रास्ते हैं। गर्भगृह के बीचों बीच है दुनिया के सबसे छोटे स्वयंभू शिवलिंग में से एक औघड़नाथ शिवलिंग। जिस पर भक्त लगातार जल चढ़ाते रहते हैं। कुछ उसे छूकर तृप्त हो जाना चाहते हैं। ये शिवलिंग सिर्फ दिखने में छोटा है, मान्यता है कि इसकी ज़मीन के भीतर कोई थाह नहीं है।


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औघड़नाथ शिवलिंग की खोज भी आज़ादी से पहले की बताई जाती है। कहा जाता है गुलामी के दौर में स्वयंभू शिवलिंग पहली बार तब चर्चा में आया, जब शिवचरण बाबा ने इसके बारे में सैन्य अधिकारियों को बताया। अंग्रेज़ भी इसकी महिमा तब जाने, जब एक अंग्रेज़ दंपत्ति ने साक्षात शिवलिंग का दंड झेला।


यहां शिवलिंग के साथ ही शिव-पार्वती की मूर्ति भी लगी है। जहां लोग फूल-प्रसाद इत्यादि चढ़ाते हैं। साथ ही मंदिर के बाहर एक विशालकाय नंदी की मूर्ति भी है। इतनी कहानी सुनने के बाद एक सवाल आपके मन में कौंध रहा होगा आखिर शिव के इस रूप को औघड़ क्यों कहते हैं? औघड़नाथ मंदिर सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। औघड़ शिव के एक रूप को ही कहा जाता है। इसलिए शिव के इस नाम की वजह से और मुरादों को पूरा करने की वजह से इसे औघड़नाथ मंदिर कहते हैं। मंदिर के उदभव और निर्माण की बात करें तो इसके इतिहास की कोई लिखित जानकारी नहीं है। लेकिन ऐसा माना जाता है कि पेशवा यहां आकर पूजा किया करते थे। किसी भी युद्ध पर जाने से पहले पेशवा-मराठा यहां शिव स्तुति करना नहीं भूलते थे।

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औघड़नाथ मंदिर का आज़ादी के बाद काफी विस्तार हुआ। साल 1967 से मंदिर भव्य बनना शुरू हुआ और 1972 तक मंदिर पूरा बन गया। कुछ ही सालों में इसकी लोकप्रियता दूर-दूर तक फैल गई। अब भी वक्त-वक्त में यहां काम होता रहता है। मंदिर के अंदर दीवारों पर सभी ज्योतिर्लिंगों को प्रदर्शित किया गया है। एक-एक ज्योतिर्लिंग को यहां दर्शाने में 10-10 लाख का खर्च आया है, ये पूरा काम ओरिजनल पत्थर पर हुआ है। मंदिर को लेकर क्या आम जन और क्या नेता सभी में बहुत मान्यता है। खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां चुके हैं।


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औघड़नाथ मंदिर की देखरेख के लिए एक समिति बनाई गई है। यहां पूजा पाठ इत्यादि के लिए तीन पुजारी सारंगधर त्रिपाठी, श्रीधर त्रिपाठी, चक्रधर त्रिपाठी नियुक्त किए गए हैं, तीनों भाई हैं। इसी परिसर में कई और छोटे-बड़े मंदिर हैं। इनमें हनुमान मंदिर, देवी दुर्गा का मंदिर हैं। साथ ही यहां राधा-कृष्ण का एक और बड़ा मंदिर है। जहां भगवान को छप्पन भोग लगाया जाता है। आरती के वक्त यहां का विहंगम दृश्य होता है।अगर आपको मेरठ के औघड़नाथ मंदिर पहुंचना है तो यहां जाना ज़रा भी मुश्किल नहीं है। मेरठ के कैंट इलाके में स्थित औघड़नाथ मंदिर राजधानी दिल्ली से करीब 104 किलोमीटर दूर है। कार, बस या फिर ट्रेन से मेरठ आसानी से पहुंच सकते हैं |

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