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Kuldhara गांव में 200 साल से वीरान पड़े हैं 400 घर, भूतों ने यहां किसी को बसने नहीं दिया?

पुरातात्विक साक्षों के मुताबिक कुलधरा के इन खंडहरों के बीच एक दीवार पर दो तारीखें लिखी हुई मिलीं। जो दो व्यक्तियों के निधन की तारीख के रूप में लिखी गयी प्रतीत होतीं हैं। ये तारीखें साल 1235 और 1238 ईसवी हैं। इसी बात से अनुमान लगाया गया कि कुलधरा गांव का इतिहास करीब इतना पुराना तो होगा ही। Being Ghumakkad के सामने सवाल इसके बाद भी बरकरार था कि आखिर इतना पुराना गांव होने के बाद भी कुलधरा की ये टूटी-फूटी दरों-दीवारें सन्नाटे के साये में क्यों गुजर रही हैं।

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आपने किस्सों में, कहानियों में, इंटरनेट में, सोशल साइट्स में, मुंह ज़ुबानी, कुलधरा के डर और उसके खंडहर बन चुके गावों के बारे में सुना होगा। इस रस्यमयी गांव को नज़दीक से देखने के लिए Being Ghumakkad की टीम ने थार रेगिस्तान का चप्पा-चप्पा छान लिया। आखिरकार मंज़िल करीब गयी। और हम कुलधरा के बेहद नज़दीक पहुंच गए। जैसे ही टीम Being Ghumakkad आगे बढ़ी, कुछ ही पलों में गांव का मुख्य द्वार सामने गया। यहीं से हर टूरिस्ट को वीरान कुलधरा गांव के अंदर आना और बाहर जाना पड़ता है। मुख्य द्वार से करीब 2 किलोमीटर दूर कुलधरा के खंडहर नज़र आने लगते हैं। कभी कुलधरा गांव बेहद संपन्न रहा होगा, बेहद व्यवस्थित रहा होगा, बड़ी प्लानिंग से बसाया गया होगा। कुलधरा की स्थापना के सबूत करीब 13वीं शताब्दी में मिलते हैं। 


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पुरातात्विक साक्षों के मुताबिक कुलधरा के इन खंडहरों के बीच एक दीवार पर दो तारीखें लिखी हुई मिलीं। जो दो व्यक्तियों के निधन की तारीख के रूप में लिखी गयी प्रतीत होतीं हैं। ये तारीखें साल 1235 और 1238 ईसवी हैं। इसी बात से अनुमान लगाया गया कि कुलधरा गांव का इतिहास करीब इतना पुराना तो होगा ही। Being Ghumakkad के सामने सवाल इसके बाद भी बरकरार था कि आखिर इतना पुराना गांव होने के बाद भी कुलधरा की ये टूटी-फूटी दरों-दीवारें सन्नाटे के साये में क्यों गुजर रही हैं। क्यों कोई यहां बसने का साहस नहीं जुटा सका? क्यों किस्से-कहानियों में गांव के साथ भूतिया कनेक्शन जुड़ता गया? इन सवालों के जवाब हमें मिले जमील भाई से, जो एक टूर ऑपरेटर के रूप में काम करते हैं और कुलधरा के चप्पे-चप्पे को बेहद करीब से जानते हैं।


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जमील भाई से बात करने के बाद दो बातें साफ हो गयी। पहली ये कि कुलधरा अकेला गांव नहीं था जहां के लोग गायब हो गए, बल्कि यहां 64 गांव थे, जहां से पालीवाल बाह्मणों ने एकता दिखाते हुए रातों-रात गांव छोड़ दिए, वो लोग इतनी दूर चले गए कि जैसलमेर के क्रूर दीवान सालिम सिंह की नज़र उन पर फिर कभी नहीं पड़ सकी। ये बात सच है इस कुलधरा गांव में ४०० से ज्यादा मकानों के भग्नावशेष अभी भी मिलते हैं। कहते हैं किसी ज़माने में इस गांव के पास से एक छोटी मौसमी नदी काकनी बहती थी। कुलधरा के अंदर पुराने कुएं और बावड़ियों के अवशेष भी मिल जाते हैं। इस गांव की चौड़ाई करीब २६१ मीटर और लंबाई करीब ८६१ मीटर है। कुलधरा से कुल तीन रास्ते निकलते हैं। मुख्य रास्ते पर पुरातत्व विभाग ने कुछ घरों को रीस्टोर करने की कोशिश की है। इस रास्ते पर एक मंदिर भी है।


धार्मिक मान्यताओं के अलावा कुलधरा अपनी संपन्नता के चलते जैसलमेर के रजवाड़ों को अच्छा-खासा रेवेन्यू दिया करता था। स्थानीय नदी की उपलब्धता के चलते यहां के लोग ज्वार-बाजरे की खेती किया करते थे। यहां रहने वाले कुशल कारीगरों ने पूरे गांव को व्यवस्थित तरीके से बसाया था। चौड़े-चौड़े रास्ते, हवादार मकान। इतिहासकारों के मुताबिक उस समय यहां के 400 मकानों में करीब एक से डेढ़ हज़ार लोग रहा करते थे। जबकि बाकी सभी 64 गांवों को मिलाकर ब्राह्मणों की जनसंख्या करीब 5 हज़ार के आस-पास बतायी जाती है। लेकिन सवाल अभी भी बरकरार है आखिर रातों-रात गांव खाली होने के बाद कभी कुलधरा में कोई बसावट क्यों नहीं हो सकी?

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इस सवाल का जवाब भी यहां के किस्से कहानियों में मिल जाता है। कुलधरा गांव के वीरान होने की वजह सालिम सिंह नाम का क्रूर दीवान बना। इसलिए गांव के लोगों ने अपने दुख-दर्द को श्राप के रूप में यहां हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दिया। ऐसा कहा जाता है कुलधरा के लोग जाते-जाते श्राप देकर गए कि उनके जाने के बाद ये गांव अब कभी नहीं बस सकेगा, अगर कोई यहां रुकने की कोशिश करेगा तो उसका विनाश हो जाएगा। लोग मानते हैं इसी श्राप के चलते यहां कभी कोई रुकने का साहस नहीं जुटा पाया। लोग कहते हैं यहां सूरज ढलते ही अजीबोगरीब आहटें सुनायी देने लगती हैं। कभी-कभी चीखें सुनायी देती हैं। 


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जबकि कुलधरा पर हुए कुछ सर्वे और शोधपत्र बताते हैं कि 800 साल पहले बसे कुलधरा में धीरे-धीरे पानी का स्तर कम हो गया। चारों तरफ थार रेगिस्तान होने की वजह से अनाज उगाने में दिक्कतें आने लगीं, लोगों के भूखों मरने की नौबत गयी। एक शोधपत्र के मुताबिक कुलधरा के आस-पास भूकंप के निशान भी मिलते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के चलते गांव खाली हो गया, जिसके बाद इन खाली मकानों ने किस्से-कहानियों को जन्म देना शुरू कर दिया। आर्कियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया ने यहां खंडहर बन चुके कुछ मकानों को रीस्टोर करने की कोशिश की है। लेकिन कई घर री-स्टोर करने के बाद भी टिक नहीं पाते हैं।

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भूतिया किस्से-कहानियों के प्रचार के चलते कुलधरा एक बड़ा पर्यटन केंद्र बन चुका है। राजस्थान सरकार ने कुलधरा में एक जुरासिक केक्टस पार्क, कॉटेजेज़ और कुछ दुकानें खोल दी हैं। सरकार को यहां से अच्छी खासी कमायी होने लगी है। कुलधरा की लोकप्रियता के चलते यहां एजेंट विनोद जैसी हिंदी फिल्म की शूटिंग हो चुकी है। अगर आप भी कुलधरा की लोकप्रियता और खंडहर हो चुके मकानों को करीब से देखना चाहते हैं, तो एक बार ज़रूर जाइए जैसलमेर। गारंटी है कुलधरा के खंडहर आपको वहां खुद खुद खींच लेंगे। जैसलमेर, हवाई, सड़क और ट्रेन नेटवर्क से भलीभांति जुड़ा हुआ है।

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